Sunday, 19 May 2019

रिश्तो में ठगी गई हूं मै...!!!

रिश्तो में ठगी गई हूं मै...
ना जाने किसने सिखाया था,
याद नही किसने बताया था..
कहाँ से मुझमे ये हुनर आ गया,
रिश्तो को निभाने का..
भावुक थी हर रिश्ते को,
जज्बातों से निभाती रही..
दिमाग से चलने वाली दुनिया मे,
दिल से रिश्ते निभाती रही हूं मैं...
रिश्तो में ठगी गयी हूँ मैं...
मैंने तो उन रिश्तो को भी,
अपने खून से सींचा है,जो खून के नही थे..
उस रिश्ते के भी सातों वचन निभाये,
जो फेरो में बंधे भी नही थे...
कोई साथ देगा या नही देगा,
बिना ये सोचे इन रिश्तो के लिए,
दुनिया से लड़ गयी हूँ..
आज जब पीछे मुड़ कर देखती हूँ,
तो अकेली ही खड़ी हूँ मैं...
निश्छल समर्पित रही इन रिश्तो के लिए...
आज वही रिश्ते,
सवाल बन कर खड़े है सामने,
पूछते है कि क्या हमने कहा था?
रिश्तो को निभाने को...
इस बचकाने से सवाल पर,
खुद पर हँस पड़ी हूँ मैं...
कि रिश्तो में ठगी गयी हूँ मैं...!!!

Wednesday, 3 April 2019

वो लाल रंग की चूड़ियां...!!!

वो लाल रंग की चूड़ियां,
आज भी सम्हाल कर रखी है करीने से,
जब भी चाहती हूं...
कि तुमसे कुछ बाते कर लूं,
हाथो में पहन लेती हूं,खनकती,चहकती है,
मेरी हर बात का जवाब देती है..
मेरे पास चूड़ियां तो और भी रंगों की है,
पर ना जाने क्यों,ये लाल रंग की
तुम्हारी दी हुई चूड़ियां,
अपनी कलाई पर,
तुम्हारे स्पर्श का एहसास कराती है,
जब इन्हें पहनती है,
तो लगता है कि जैसे,
तुम मेरा हाथ थाम कर चल रहे हो...!!!

Saturday, 16 March 2019

एक ही जिंदगी है,एक ही तुम हो..!!!

मैं वक़्त को तुम्हारे साथ अपनी मुठ्ठियों में,
बांध लेना चाहती हूं..
एक ही जिंदगी है,एक ही तुम हो.
तुम्हे जी भर जी लेना चाहती हूं...
मैं आसमां को अपने आँचल में,
भर लेना चाहती हूं..
एक ही जिंदगी है,एक ही तुम हो,
तुम संग उड़ जाना चाहती हूं..
हर राह को मंजिल मान लेना चाहती हूं,
एक ही जिंदगी है,एक ही तुम हो,
हर सफर तुम्हारे साथ तय करना चाहती हूँ...
हर रिश्ते,हर अंदाज़ में,
तुम्हे ही पाना चाहती हूं...
एक ही जिंदगी है,एक ही तुम हो,
तुम्हारे संग तुम जैसी हो जाना चाहती हूं...
रंग होली के,चमक दीवाली की..
नजारे सभी तुम्हारी आँखों से देखना चाहती हूँ...
एक ही जिंदगी है,एक ही तुम हो..
तुम्हारे एहसास को हर त्योहार में,
महसूस करना चाहती हूं...आहुति

Thursday, 7 February 2019

चलो फिर आज बता ही देती हूं...!!!

चलो फिर आज बता ही देती हूं,
वो सब कुछ आज तक कभी,
तुमसे कहा ही नही..
कि बात कोई भी हो मेरे जीवन की,
तुम्हारी बात होती है...
बता ही देती हूं,छुप कर बहुत बार,
तुम्हारी आँखों को खुशी चुम भी लेती हूं..
बता ही देती हूं,
कि मेरी लिखी हर पंक्ति में,
ज़िक्र सिर्फ तुम्हारा होता है,
जीत हो हार हो,तुमसे शुरू,
तुम पर खत्म सारा जीवन होता है...
बता ही देती हूँ कि तुम्हे जो भी पसंद है,
वो सब अब मेरी पसंद हो गई है,
अब जिंदगी मैं तुम्हारी आखो से देखती हूँ..!!!

Thursday, 10 January 2019

किताबो के बाजार में...!!!

मैं आज फिर पहुँची,
किताबो के बाजार में,
हर किताब में मैंने गौर से निहारा,
हर अक्षर को छू कर देखा..
कि कोई पंक्ति रच कर,
तुमने मेरे लिए किसी किताब में रख दी होगी..
मैं ढूंढ लूं,वो चिट्ठियां जो तुमने लिखी तो होगी,
पर मुझे भेजी नही होगी...
हाँ मुझे याद है तुमने कहा था,
इक दिन कि जब मैं तुम्हे कही ना मिलूं,
तो तुम मुझे किसी पुस्तक मेले में,
किसी किताब में..
किसी पंक्ति में ढूंढ लेना,मैं मिल जाऊंगा..
अक्षरों को छू कर महसूस कर लेना,
मेरे दिल का हाल..
यही सोच हर बार,
मैं आती हूँ पुस्तक मेले में,
ढूंढती हूँ तुम्हे हर किताब में,
हर अक्षर में..
तुम तो मुझे कही नही मिलते,
पर हाँ तुम्हारा रचना रचने का अंदाज़,
जिन पंक्तियों में महसूस कर पाती हूँ,
मैं वो सारी किताबे ले आती हूँ,
ये सोच कर शायद तुम होते तो ,
तुम भी उन्हें ही पढ़ते..
ले जाते अपने साथ...
छोड़ आती हर किताब में,
अपनी उंगलियों की छुअन,
कि शायद तुम भी मुझे ढूंढते हुए,
कभी यही आ जाओ....!!!

Monday, 7 January 2019

किताबो के बीच, तुम्हे ढूंढती हूँ...!!!

मैं कभी बिखेर किताबो के बीच,
तुम्हे ढूंढती हूँ,
बस यूं ही....
शायद तुम मुझे मिल जाओ,
किसी पंक्ति में,किसी शब्द में...
पर ऐसा होता नही है..
मैं पहरों किताबो को निहारती हूँ,
तुम्हे वहां ना पा कर वापस,
उन्हें सहज कर रख देती हूं...
इस उम्मीद में तुम कभी तो मिल जाओगे,
यही कही किताबो में..
मैं तुम्हे पा ही लुंगी यूँ ही शब्दों में..
निहार लुंगी तुम्हे जी भर,
मन भर कर पढ़ लूंगी तुम्हे..!!!

Wednesday, 26 December 2018

सुनो दिसम्बर..जरा ठहरो..!!!

सुनो दिसम्बर..जरा ठहरो..
धीरे-धीरे गुजरो...
समेट तो लूं बिखरी हुई यादो को,
दर्ज तो कर लूँ दिल में कुछ तारीखों को,
जिनके साथ का वक़्त कभी गुजरा नही...
बांध कर रख लूं...
उन्हें नजरो से जो छोड़ कर चले गए,
थाम लूं उन हाथो को,
जो बिछड़े तो है पर छूटे नही है...
सुनो दिसम्बर..जरा ठहरो..
जी तो लूँ उन लम्हो को,
जो ठहरें तो है पर अभी गुजरे नही है...!!!