Saturday, 9 December 2017

तारीखे कहाँ बदलती है....!!!

तारीखे कहाँ बदलती है,
ये तो बदलते वक़्त के बार-बार,
खुद दोहराती है...
गुजरी तारीखों में कैद कुछ यादो को,
हम उन्ही तारीखों के लौट आने पर,
फिर उन्हें जीते है...
दर्द हो या खुशी,हम उलझे रहते है,
तारीखों के हेर-फेर में..
ये साल ये तारीखे,
सिर्फ कैलेंडर के साथ बदल जायँगे,
ये तारीखे तो कैलेंडर में,
फिर वापस आ जएँगी,
पर जो बिछड़ गये है हमसे,
वो सिर्फ यादो में ही राह जायँगे...
चलो हिसाब कुछ उन यादो का,
उन दर्दो का इन तारीखों का साथ कर लेते है...
तुम मिलना इस बार मुझे उन्ही तारीखों,
साथ बैठ कर कुछ बात फिर कर लेते है...
तारीखे कहाँ बदलती है,
ये तो बदलते वक़्त के,
बार-बार खुद दोहराती है...!!!

Monday, 4 December 2017

आज सारे गुबार दिल के...!!!

क्यों ना लिख दूँ,
आज सारे गुबार दिल के...
ये मौन ये चुप्पी इक दिन,
सब बिखेर कर रख देगी..
क्यों ना लिख दूँ आज सारे ज्वार दिल के....
क्यों ना शब्दो मे लपेट कर,
अपनी आँखों की उदासी को ,
कागज़ में उतार दूँ,
तुमसे मिलने बिछड़ने के किस्सो को...
शब्दो मे सही,क्यों ना जोड़ दूँ,
दिल बिखरे हिस्सो को...
क्यों ना लिख दूँ...
आज सारे गुबार दिल के...
क्यों ना हर दर्द को पंक्तियों में ढाल दूँ,!
तुम्हारे हर जवाब पर मैं इक सवाल दूँ...
क्यों ना हार-जीत का शिलशिला,
यही पर थम जाए...
ये मौन ये चुप्पी इक दिन,
सब बिखेर कर रख देगी..
क्यों ना लिख दूँ...
आज सारे ज्वार दिल के....!!!

Tuesday, 10 October 2017

बिखरती चली गई...!!!

प्यार इक शब्द...
जो दिल से दिल को जोड़ता है,
बस इतना ही तो मैं समझती थी..
कोई होता है जो,
जाने कब कहाँ मिल जाये,
कब वो किसी के ख्वाबो-ख्यालो,
पर छा जाये,
बस इतना ही तो जानती थी,
समझती थी मैं प्यार को...
तुम्हारे प्यार में यूं ही गहराइयों में,
उतरती चली गयी..
बहुत सीधी सी जो दिखती थी,
जो राहे तुम तक पहुँचने की,
जाने कब उलझती चली गयी...
मैं प्यार को अपने शब्दो से,
तुम तक पहुँचाना चाहती थी..
तुम्हारे शब्दो को घाव से,
मैं किसी असहनीय दर्द की खाई में,
धसती चली गयी....
तुम्हे मुस्कराने की वजह ढूंढती रही हर पल,
हर पल के साथ,
मै हँसी अपनी खोती चली गयी....
तुम्हारा साथ देने की जिद में..
मैं खुद को छोड़ कर,
तुमसे जुड़ती चली गयी...
तुम छोड़ कर जब चले गये..
मैं तब हर पल टूट कर,
बिखरती चली गई...!!!

Sunday, 1 October 2017

तुम्हारे साथ जीना चाहती थी....!!!

मुझे हमेशा सरप्राइज पसंद थे,
और तुम हमेशा प्लानिंग में लगे रहते थे...
मैं तुम्हारे होठो पर इक मुस्कान के लिए,
कोई मौका नही गवाती थी,
गर वजह ना भी हो तो वजह बना लेती थी..
और तुम मुस्कराने में भी सोचते थे...
बहुत अलग थे हम दोनों...
बिल्कुल अलग...
मुझे प्यार की नादानियां पसंद थी,
तुम समझदारियो में उलझे रहे...
मैं बेवजह हँसना,
खिलखिलाना चाहती थी,
और तुम मुझे तहजीब और
अदब समझाते रहे...
मैं जिंदगी की मुश्किलें,
मुस्करा कर आसान करना चाहती थी,
तुम आसान जिंदगी को,
अपनी खामोशियो से,
मुश्किल बनाते चले गये...
मैं जिंदगी तुम्हारे रंग में,
ढालना चाहती थी और तुम,
मुझे बदलते चले गये...
अब क्या कहूँ तुमसे....बाबुमुशाय....
जिंदगी लम्बी नही....बड़ी होनी चाहिए....
मैं जिंदगी का हर पल सिर्फ गुजारना नही,
तुम्हारे साथ जीना चाहती थी....!!!

Thursday, 21 September 2017

मुझ तक पहुँच जाओगे...!!!

मैं आज किसी सुकून की तलाश में,
उन जगहों पर जा कर,
पहरों बिता आती हूँ,
जिस जगह तुम घंटो बैठा करते थे..
तुम्हारी खुशबू हर तरफ महसूस करती हूं,
ना जाने क्यों तुम्हारे ना होने में भी..
तुम्हारे होने का एहसास कराती है...
हर इक लम्हा जैसे तुम्हारी ही बाते करता हो,
मैं कहती कुछ नही,
फिर जैसे तुम मुझे सुन रहे होते हो....
बेवजह जो वक़्त गुजरता नही है...
इक तुम्हारे होने के एहसास के साथ,
पहरों गुजर जाते है...
शायद इस इंतजार में कि,
तुम भी कभी मुझे ढूंढते हुए...
मुझ तक पहुँच जाओगे...!!!

Friday, 1 September 2017

मैं तो सिर्फ तुम्हारी होना चाहती हूं....!!!

मेरी-तुम्हारी सोच से कही परे था...
अमृता,साहिर और इमरोज़ को समझना...
इक ऐसी उलझन,
जिसे जैसे कोई सुलझाना ही ना चाहता हो..
बस इन तीनो की प्यार की,
गहराई की हदो के पार की,
परिभाषाएं समझना चाहते है...
जहां अमृता साहिर की होना चाहती है...
वही इमरोज़ अमृता के होना चाहते है....
कोई किसी को पाना नही चाहता,
सिर्फ उसी का हो जाना चाहता है....
अच्छा सुनो...
तुम क्या बनना चाहते हो,
अमृता,साहिर या इमरोज़..
तुम जो भी बनो...
मैं तो सिर्फ तुम्हारी होना चाहती हूं....!!!

कभी मैं यूँ ही सोचती हूँ....!!!

कभी मैं यूँ ही सोचती हूँ,
गर मैं तुम्हे ना मिलती तो कहां होती...
हाँ शायद खुले आसमान में,
उड़ रही होती....
कभी मैं यूँ ही सोचती हूँ,
गर मैं तुम्हे ना लिखती तो क्या होती...
हाँ शायद किसी कवि के ख्यालो की,
मैं भी कोई कविता होती...
[कभी मैं यूँ ही सोचती हूँ,
गर मैं तुम्हारी मंजिल ना होती,
तो क्या होती...
हाँ शायद किसी मुसाफ़िर का,
कोई भुला हुआ रास्ता होती...!!!