Sunday, 21 May 2017

तुम्हारे साथ जिनसे मुझे प्यार हो गया...!!!

चलो इक बार फिर,
तुम मुझे कॉफी पर बुलाओ,
और हमेशा की ना करते हुए हाँ कर दूँ....
तुम्हारा कॉफी पर बुलाना,
इक बहाना था,
गुजरे पलो को दोहराना होता है...
तुम वही शर्ट पहन कर आओ,
जिसे कभी मैंने कहा था,
कि तुम पर अच्छी लगती है...
मैं वही रंग पहन कर आऊं,
जो तुमको बहुत पसंद था..
हम इस तरह इक-दूसरे को,
देख कर मुस्करा दिए,कि
याद तो अभी भी हमें सब कुछ है....
ना जाने क्यों तुम्हारे साथ जब भी होती हूँ,
सालो बाद भी कैपिचीनो कॉफ़ी का,
स्वाद वही होता है...
वही मिठास तुम्हारी बातो की लगती है,
और थोड़ी सख्त तुम्हारे अंदाज़ जैसी होती है...
पर इक बात मुझे आज तक,
समझ नही आई...
वैसे फोन पर तो तुमसे बहुत बाते करती हूँ,
पर जब तुम सामने होते हो,
जाने क्यों कुछ सूझता ही नही..
जैसे ही नजरो से नजरे मिल जाती,
धड़कने बढ़ जाती और,
मैं सब कुछ भूल जाती हूँ...
और तुम मुझे चिढ़ाते हुऐ कहते हो,
अब बताओ तुम्हे कितनी बाते करनी है.....
मैं सिर्फ मुस्करा कर रह जाती हूँ,
कैसे कहूँ तुम्हारा मेरे सामने होना ही,
सारी बातों का मतलब होता है....
सच कहूं तो ये कॉफी मुझे नही पसंद...
बस तुम्हारे साथ ही कॉफी पीती हूँ...
यही वो लम्हे है...
तुम्हारे साथ जिनसे मुझे प्यार हो गया...!!!

Friday, 19 May 2017

कुछ बिखरी पंखुड़ियां.....!!! भाग-41

381.
मुझमे तुम में सिर्फ इतना फर्क है,
मैंने तुम्हे उम्मीदों से बंधा है,
तुमने मुझे शर्तो से बांधा है.....

382.
कभी-कभी यूँ ही जिन्दगी की हर बात अच्छी लगती है.....
जानते हो क्यों.....क्यों की तुम अच्छे लगते हो....

383.
मैं कब से उन शब्दों का इन्तजार कर रही हूं,
जिन्हें मैं लिखूं भी नही...और तुम मेरे मौन में पढ़ लो...

384.
मुझसे अभी तक यूँ ही,
बहुत कुछ लिख़ गया है....
तुम्हे लिखते-लिखते......

385.
अब तुम्हारे बिना,
आसान सफर भी मुश्किल लगता है...
तुम साथ होते हो तो,
समंदर का भंवर भी साहिल लगता है...

386.
नही पता कि ये लगाव ये अपनापन क्या होता है,
पर जब-जब तुम्हारा दिल धड़कता है,
मुझे मेरे होने का एहसास होता है....

387.
क्यों लगता है कि तुम होते सब अच्छा होता...
या यूँ कहूँ की तुम होते तो...
सब अच्छा लगने लगता...

388.
अपनी तलाश पर निकलूं भी तो क्या फायदा...
तुम बदल गये हो...खो गये होते तो...
कुछ और बात होती....

389.
मैं ख़ामोशी से कुछ लिख दूंगी,तुम भी चुपके से पढ़ लेना..

390.
तुम्हारी आँखों की वो अनकही बात थी,
जो मुझे तुमसे दूर जाने नही देती...
तुम्हारी बातो की वो बेरुखी थी,
जो मुझे तुम्हारे पास आने नही देती....

391.
कविता कहाँ किसी की होती है..
जो जैसे पढ़ता है..
इसको ये तो वैसे ही..
उसी की होती है.....

392.
चाहती हूँ मैं कि अपनी हर नज़म.. हर पंक्ति तुम्हारे नाम लिख दूँ...चाहती तो मैं ये भी हूँ कि जब जिक्र प्यार का हो तो....
प्यार मिटा कर तुम्हारा नाम लिख दूँ...

393.
मैं तुम्हारे साथ हमेशा रहूंगी...हर हाल में...
तुम नही भी चाहोगे, तब भी......

394.
मैं बहुत बड़ी writter बनना चाहती हूँ.....
शर्त ये कि.....तुम उसकी वजह बन जाओ....

395.
मैं तुम्हे तलाश करूँ...
और तुम मुझे मिल जाओ...
इतनी तो आसान नही जिन्दगी....

396.
तुम यूँ ही ख़ामोशी से मुझे सुनते रहो,
तो यकिनन मैं इक दिन...
कुछ मुक्कमल लिख ही दूंगी....

397.
तुम्हे पता है मैं कोई कविता-सविता नही लिखती हुँ..
मैं तो वो लिखती हूँ....जो तुम कह नही पाते हो....

कुछ बिखरी पंखुड़ियां.....!!! भाग-40

371.
इक लम्हा तेरी नजरो में मैं ठहर जाऊं,
इक लम्हा मेरी साँसों से गुजर जाये....
बस इन्ही दो लम्हो में,
हमारी जिंदगी गुजर जाये...

372.
फिर इक बार.....
मैं शब्दों को गढ़ लूँ,
कि शब्द अब मिलते नही मुझे...
तुम जो पढ़ लो इक बार,
तो....मैं फिर कविता बन जाऊं..

373.
मुझे सुकून है कि मैंने हर मुमकिन कोशिश की,
तुम्हे रोकने की....तुम पछताओगे कि,
तुम ठहरे क्यों नही...

374.
तुम क्या समझोगे प्यार क्या होता है,
जहां दिल की चलती है,
वहां तुम दिमाग चलाते हो....

375.
मेरा तुम्हारे साथ होना मेरी मर्जी है,
गर तुमने मेरी मज़बूरी समझ लिया
ये तुम्हारी ग़लतफ़हमी है....

376.
कभी मैं प्यार के लिये लिखा करती थी,
अब लिखने के लिये प्यार लिखती हूँ...

377.
किसी का साथ पसंद है तो फिर,
ये नही देखा जाता की साथ कितनी देर का है.....
देखा तो बस इतना जाता है,
की दो पल भी अगर साथ है....
तो मुकम्मल साथ रहे......!!

378.
जब कभी जो कही मैं डर जाऊं...
या हार के टूटने लगूं..तुम मेरा हाथ अपने हाथो में मजबूती से पकड़ कर रखना...यक़ीनन मैं टूट भी गयी तो..कभी बिखारुंगी नही....

379.
कविता मैं लिख दूंगी कहानी तुम लिख लेना..
मैं तुम्हारे लम्हो को जी लुंगी,
तुम मेरी जिंदगी जी लेना...

380.
मैं तो पूरी दुनिया को शब्दों में बांध लुंगी,
अगर तुम मुझे पढ़ने की ठान लो....

कुछ बिखरी पंखुड़ियां.....!!! भाग-39

361.
तुम्हारे हर झूठ को मैं सच मान लेती हूँ,
झूठ के पीछे का भी सच जान लेती हूँ..
.जब तुम सोचते हो कि तुमने मुझे झूठ से बहला दिया,
उस पल मैं तुम्हारे लिए सिर्फ तुम्हारे लिए....
खुद को पागल मान लेती हूँ...

362.
हर बार यूँ ही मुस्करा कर मिली हूँ....तुमसे,
डर था कही.....तुम चेहरे पर उदासी ना पढ़ लो...

363.
जब तुम पढ़ लेते हो मुझको,
मैं शब्दो से निकल कर,सज जाती हूँ तुम्हारे होठो पर....

364.
नही याद की उसके साथ पी थी,
चाय और कॉफ़ी का स्वाद क्या था...
सिर्फ ये याद रह गया....
कि उस शख्स की आखों में क्या-क्या था.

365.
मैं चाहती हूँ इक चांदनी रात,
जो सिर्फ मेरी और तुम्हारी हो...
हो चांदनी कुछ नाराज चाँद से,
उस रात चांदनी सिर्फ हमारी हो..

366.
कितना कुछ हो जाता है,दुनिया में यूँ ही बेवजह....
फिर तुम्हे मेरा बनने में क्यों चाइये कोई वजह...

367.
ढलती शामे,चाँद,तारे,राते,चाँदनी..
साँसे,अहसास,दिल,धड़कन...
सौं बातों का इक ही मतलब ...
सिर्फ तुम...और तुम ही तुम..

368.
तेरी बातो से मेरी..
हर इक रचना रच जाती है...
कविता तो मैं लिखती हूँ...
कविता जैसी बाते..
तुमको आती है...

369.
इक पूरी जिंदगी गुजार दी हमने,
इक अच्छी जिंदगी,
जीने की तैयारी में......

370.
रात भर दिये की रौशनी लिये,
तुम्हारी राहो में तुम्हारी राह तकती रही...
ना दिये को बुझने दिया,
बाती संग मैं भी जलती रही...

कुछ बिखरी पंखुड़ियां.....!!! भाग-38

351.
लगता है की जीवन यही है.....
बस यही है.......एक सपना...और
एक डर.....उस सपने के टूटने का.......

352.
चाहती हूँ...कि मैं इस कदर तुम्हारे ख्यालों में आऊ...
तुम पढ़ो किसी भी किताब को..
मैं हर अक्षर में उभर जाऊं..

353.
किसी की गलतियां बता कर,
उसे छोड़ देना बहुत आसान है....
पर उन गलतियों की वजह जान कर,
उसे माफ़ करना इतना भी मुशकिल नही है...

354.
तुम रहने दो मेरे मन को बहलाने को,
तुम बिन ही....
मैंने मन को मना लिया है....

355.
उसके हाथो की गिरिफ्त ढीली पड़ी तो महसूस हुआ...
यही वो जगह है..जहाँ रास्ता बदलना है...

356.
गुस्ताखियां भी आपकी
नाराजगिया भी आपकी...
गज़ब अंदाज़ है....
आपकी चाहत के........

357.
मैं खुबसूरत हूँ या नही.. ये नही जानती....यक़ीनन वो आखेँ बहुत खुबसूरत है....जिन्हें मैं खुबसूरत लगती हूँ....

358.
इन लम्हो को कैद करके,कुछ तो आसान कर ली है जिंदगी.....!!!

359.
इक चोट से कांच कि तरह टूट कर बिखरी है जिंदगी....
जब भी टुकड़ो को समेट कर जोड़ने कि कोशिश की,
इक और चोट देती है जिंदगी.....

360.
तुम्हारी मुस्कराहटे....
मेरी दम तोड़ती जिन्दगी में.....
साँसों का काम करती है....

कुछ बिखरी पंखुड़ियां.....!!! भाग-37

341.
बहुत डर लगता है जिस बात के लिए,
तुमसे दूर चली आयी थी,
वही बात फिर ना हो जाये....
तुम मिलो और मुस्करा दो,
और मुझे फिर से तुमसे प्यार ना जाये.

342.
जब नजदीकियाँ अखरने लगे,
तो नजदीकियाँ बनी रहे....
इसलिए दूरियां बढ़ा लेनी चाइये....

343.
जब से तुमने मेरा थामा है...
मैं तेज और तेज चलने लगी हूँ...
तारीखों में तो साल आज गुजर रहा है..
मेरी जिन्दगी में हर इक पल में,
सदियां गुजर गयी है....

344.
क्यों ना फिर तुम्हारा हाथ थाम कर इस धुंध में खो जाऊं.....

345.
कही कोई वक़्त से लम्हे,
चुरा कर तुम्हे दे दूंगी,
तुम सिर्फ मुस्करा देना..
मैं तुमसे कानो में कुछ कह दूंगी....

346.
अपनी उदासियों से भागती रही हूँ मैं.....
एक ख्वाब कि तलाश में....
कितनी रातो से जागती रही हूँ मैं....!!

347.
तुम्हारे लिये जो सिर्फ जिन्दगी के कुछ पल थे....
मेरे लिये उन पलों में ही जिन्दगी थी..

348.
मैं तब किसी रियासत की रानी,
जैसा महसूस करती हूँ,
जब तुम कहते हो की,
मैं तुम्हारे दिल में राज करती हूँ...

349.
क्यों कोई तुमने प्यार का नाम नही दिया मुझे,
क्या मैं तुम्हे इतनी प्यारी ना लगी....

350.
ना जाने क्यों तुम हो फिर भी कुछ कमी सी है,
जिंदगी तो तुम्हारे साथ ही है....
ना जाने क्यों लगता है जिंदगी छली सी है...

कुछ बिखरी पंखुड़ियां.....!!! भाग-36

331.
मैं जब भी उदास दिखूं,
तुम कुछ ना करना,
सिर्फ थोड़ा सा मुस्करा देना....

332.
सभी मंजिले तुम्हारी ही है...
मुझे तो सिर्फ तुमको
उन तक पहुँचाने रास्ते बनाने है....

333.
कुछ 'लकीरे' किस्मत से चुराई है....तुम्हारे लिए...
तुम कहो तो तुम्हारी हथेलियों पर....सजा दूँ .....

334.
तुम्हे खूब आता है.....
मुझे अपनी बातो में बहला लेना......
तुम्हे खूब आता है.......
बिना कुछ कहे.... मुझको मना लेना....

335.
मैं लेखिका तो नही हूँ,
हाँ पर लिख देती हूँ वो सब,
जो मैं तुमसे कह नही पाती हूँ...

336.
मैंने अपने पर काट लिए,क्यों की
मैं तुम्हे आसमान की उच्चाईयां,
छूते देखना चाहती हूँ....

337.
अब मैंने भी मन को मारना सीख लिया है....
अब मैं भी मन के की मन नही सुनती हूँ,
मन को समझाना सीख लिया है.....

338.
कुछ भी तो गुजरता नही....
दिल के किसी कोने में ठहर जाता है...
याद बनकर..
क्या खोया ? क्या पाया ?...
इस गुजरे वक़्त में आ गया....
नया साल एक जवाब है....
सामने सवाल बनकर......

339.
कुछ नही कहूँगी,सिर्फ तुम्हारे साथ जब होती हूँ,
हर पल नया,हर तारीख नयी,हर साल नया होता है....

340.
कुछ कहूँगी फिर भी कम ही होगा,
तुम्हे देख कर ग़र मुस्करा,
कर आँखे झुका लूँ,
तो समझ लेना...
जो मैंने कहा नही...