Monday, 19 June 2017

मेरी और तुम्हारी...!!!

हर कोई पढ़ लेता है आँखे,
मेरी और तुम्हारी...
हम बताये या ना बताये,
लोग खुद ही कितने किस्से गढ़ लेते है...
मेरे और तुम्हारे....
हम मुस्करा भी दे,
गर इक-दूजे को देख कर,
कितने कहकहे बना लेते है..
मेरे और तुम्हारे...
मैं कुछ लिख भी दूँ,
तो मेरे शब्दों में अंदाज़ तुम्हारे पढ़ लेते है...
मैं लिखती तो सिर्फ कविता हूँ,
उनमे लोग कहानियां गढ़ लेते...
मेरी और तुम्हारी....

2 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल गुरूवार (22-06-2017) को
    "योग से जुड़ रही है दुनिया" (चर्चा अंक-2648)
    पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

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  2. बहुत सही.. सचमुच लोग कहानियां गढ़ने लगते हैं. सुंदर रचना 👏 👏 👏
    Sudhaa1075.blogspot.com

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