Friday, 19 May 2017

कुछ बिखरी पंखुड़ियां.....!!! भाग-41

381.
मुझमे तुम में सिर्फ इतना फर्क है,
मैंने तुम्हे उम्मीदों से बंधा है,
तुमने मुझे शर्तो से बांधा है.....

382.
कभी-कभी यूँ ही जिन्दगी की हर बात अच्छी लगती है.....
जानते हो क्यों.....क्यों की तुम अच्छे लगते हो....

383.
मैं कब से उन शब्दों का इन्तजार कर रही हूं,
जिन्हें मैं लिखूं भी नही...और तुम मेरे मौन में पढ़ लो...

384.
मुझसे अभी तक यूँ ही,
बहुत कुछ लिख़ गया है....
तुम्हे लिखते-लिखते......

385.
अब तुम्हारे बिना,
आसान सफर भी मुश्किल लगता है...
तुम साथ होते हो तो,
समंदर का भंवर भी साहिल लगता है...

386.
नही पता कि ये लगाव ये अपनापन क्या होता है,
पर जब-जब तुम्हारा दिल धड़कता है,
मुझे मेरे होने का एहसास होता है....

387.
क्यों लगता है कि तुम होते सब अच्छा होता...
या यूँ कहूँ की तुम होते तो...
सब अच्छा लगने लगता...

388.
अपनी तलाश पर निकलूं भी तो क्या फायदा...
तुम बदल गये हो...खो गये होते तो...
कुछ और बात होती....

389.
मैं ख़ामोशी से कुछ लिख दूंगी,तुम भी चुपके से पढ़ लेना..

390.
तुम्हारी आँखों की वो अनकही बात थी,
जो मुझे तुमसे दूर जाने नही देती...
तुम्हारी बातो की वो बेरुखी थी,
जो मुझे तुम्हारे पास आने नही देती....

391.
कविता कहाँ किसी की होती है..
जो जैसे पढ़ता है..
इसको ये तो वैसे ही..
उसी की होती है.....

392.
चाहती हूँ मैं कि अपनी हर नज़म.. हर पंक्ति तुम्हारे नाम लिख दूँ...चाहती तो मैं ये भी हूँ कि जब जिक्र प्यार का हो तो....
प्यार मिटा कर तुम्हारा नाम लिख दूँ...

393.
मैं तुम्हारे साथ हमेशा रहूंगी...हर हाल में...
तुम नही भी चाहोगे, तब भी......

394.
मैं बहुत बड़ी writter बनना चाहती हूँ.....
शर्त ये कि.....तुम उसकी वजह बन जाओ....

395.
मैं तुम्हे तलाश करूँ...
और तुम मुझे मिल जाओ...
इतनी तो आसान नही जिन्दगी....

396.
तुम यूँ ही ख़ामोशी से मुझे सुनते रहो,
तो यकिनन मैं इक दिन...
कुछ मुक्कमल लिख ही दूंगी....

397.
तुम्हे पता है मैं कोई कविता-सविता नही लिखती हुँ..
मैं तो वो लिखती हूँ....जो तुम कह नही पाते हो....

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