Monday, 9 January 2017

'आहुति"लिखती है...!!!

मैंने आज खुद को किताबो के,
बाजार में देखा,
मोल मिल गया उन शब्दों को,
जो मेरे लिए अनमोल थे,
सभी पढ़ रहे है तुमको,
इक सिवा तुम्हारे,सभी जानते है,
तुमको,इक तुम्ही अंजान रहे...
मेरे इक-इक शब्द में,
इक-इक पंक्ति में,
सभी अपने प्रिय की,
तस्वीर खीचते है,
जो सिर्फ और सिर्फ,
तुम्हारे लिए थी,उन रचनाओं को,
सभी अपनी-अपनी पंक्ति मानते है...
मैं अब मैं ना रही,
मुझे अब कहाँ लोग,
पहचानते है,तुमको ही पढ़ते है,
तुम्ही से अब मुझे,
सभी जानते है...
कभी फुरसत हो,
तो पूछ लेना किसी से "आहुति"को..
कह देंगे वो भी,
कि वो भी खूब है
वो जिसे "आहुति"लिखती है...!!!

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