Sunday, 1 January 2017

कुछ बिखरी पंखुड़ियां.....!!! भाग-33

301.
कविता मैं लिख दूंगी कहानी
तुम लिख लेना..
मैं तुम्हारे लम्हो को जी लुंगी,
तुम मेरी जिंदगी जी लेना..

302.
मैं तो पूरी दुनिया को,
शब्दों में बांध लुंगी,
अगर तुम मुझे पढ़ने की ठान लो....

303.
मुझमे तुम में सिर्फ इतना फर्क है,
मैंने तुम्हे उम्मीदों से बंधा है,
तुमने मुझे शर्तो से बांधा है.....

304.
कभी-कभी यूँ ही जिन्दगी की.
हर बात अच्छी लगती है.....
जानते हो क्यों.....
क्यों की तुम अच्छे लगते हो....

305.
इतना भी मुश्किल नही था,
सब कुछ आसान कर देना,
जितना आसान था तुम्हारे लिये,
आसान को मुश्किल कर देना.....

306.
मैं कब से उन शब्दों का,
इन्तजार कर रही हूं,
जिन्हें मैं लिखूं भी नही...
और तुम मेरे मौन में पढ़ लो...

307.
जब से तुमसे मिली...
मैं प्रेम को लिखने लगी...
जब तुम्हारी आखों की,
गहराईयों में उतरी तो...
अंतहीन..अद्रश्य...
प्रेम को मैं लिखने लगी..

308.
मुझसे अभी तक यूँ ही,
बहुत कुछ लिख़ गया है....
तुम्हे लिखते-लिखते......

309.
नही पता कि ये लगाव,
ये अपनापन क्या होता है,
पर जब-जब तुम्हारा,
दिल धड़कता है,
मुझे मेरे होने का एहसास होता है....

310.
अपनी तलाश पर निकलूं,
भी तो क्या फायदा...
तुम बदल गये हो...
खो गये होते तो...
कुछ और बात होती...

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