Thursday, 20 April 2017

तुम तो हार तभी गये थे...!!!

तुम्हारे लिए मुझे त्याग देना आसान था,
क्यों की तुम महान बनाना चाहते थे...
तुम खुद को संयम में,
बांध कर जीना चाहते थे,
क्यों कि तुम इक मिशाल बनाना चाहते थे...
मुझे नही पता कि,
तुम्हे तकलीफ हुई थी या नही...
पर तुम मुझे तकलीफ में छोड़ कर,
मुझे नजरअंदाज करके,
छोड़ कर चले गये...क्यों कि
इक आदर्श बनाना चाहते थे...
तुम्हे दिखाना था कि,
तुम किस तरह सब कुछ..
छोड़ सकते हो,
तुम्हे सभी को बताना था कि,
ये दुनिया....ये समाज तुम्हारे लिए,
कितना मायने रखता है....
मैने कोई शिकायत नही की तुमसे,
तुम्हारी हर नाराजगी पर चुप हो गयी..
तो तुमने खुद को योद्धा मान लिया...
मैंने प्यार में तुम्हे सर्वस्व अर्पित कर,
तुम्हारे सजदे में,
अपना सर झुका दिया...
तो तुमने खुद को महात्मा मान लिया....
तुम्हारी हर मुश्किल में,
मैं ढाल बन कर खड़ी रही,
तुम्हारी हर कमजोरी में,
तुम्हारा संबल बनी रही...
तो तुमने इसे मेरी जरुरत मान लिया....
तुम गलत थे...
हाँ मेरे लिए तुम महान,आदर्श,योद्धा,महात्मा,
सब कुछ थे..
कभी खुद को मेरी नजरो से देखते...
पर तुमने खुद को,
हमेशा दुनिया की नजरों से देखा...
इसलिए मेरी नजरो में,
तुम्हारे लिए जो सम्मान,जो प्यार था...
तुम देख ही नही पाये...
मैं जब भी कमजोर पड़ी,
तुम्हारे साथ के लिए गिड़गिड़ाई,
तो तुमने इसे...
अपनी जीत मान लिया......
मैं तो सिर्फ इक रिश्ते को,
निभाने की हर भरकस कोशिश कर रही थी,
पर अफ़सोस तुमने,
इसे भी मेरी जरुरत समझ लिया....
पर सच तो ये है...
तुम तो हार तभी गये थे,
जब तुम्हारी वजह से,
मेरी आँखों में आंसू थे....!!!

Wednesday, 19 April 2017

यूँ ही तुम्हारे साथ इक सफर याद आ गया...!!!

यूँ ही तुम्हारे साथ इक सफर याद आ गया...
मेरी गोद में तुम सर रख सो रहे थे,
और मैं तुम्हे निहार रही थी...
और रेलगाड़ी की खिड़की से चाँद,
हम दोनों के साथ-साथ चल रहा था...
इक सुकून था तुम्हारे चेहरे पर,
और इक मुस्कराहट थी,
तुम्हे निहारते मेरी आँखों में....
बहुत बेचैन था,
उस सफर पर वो चाँद,
अपनी चांदनी की याद में...
हम दोनों को देखने को,
चाँद हमारे पीछे-पीछे भाग रहा था,
वैसे तो मुझे हर रोज चिढ़ाता था,
चाँद अपनी चांदनी के साथ...
आज तो मैं भी चाँद को देख कर,
यूँ मुस्करा रही थी,
कि जैसे कह रही हूँ..कि आज तो,
मैंने भी अपने चाँद के साथ हूँ..

Wednesday, 29 March 2017

वो तुम्हारी आँखों की खामोश बाते..!!!

वो तुम्हारी आँखों की खामोश बाते,
ना जाने कब मुझे समझ आने लगी,
वो कुछ ना कह कर तुम्हारा मुस्करा देना,
ये अंदाज़ तुम्हारे....
ना जाने कब मेरी धड़कनो को बढ़ाने लगे..
मंजिले तो कब की,
मैंने पीछे छोड़ दी,
ना कब तुम्हारे साथ...
ये सफर ही मुझे रास आने लगे....
वो चाँद,वो तारे,
वो रातो की बाते अब लिखी जाती नही मुझसे..
अब तो मेरे ख्यालो में,
सिर्फ तुम्हारे एहसास मुस्कराते है,
मेरी धड़कनो से तुम्हारे जज्बात,
मेरे शब्दों में लिखने लगे...
वो तुम्हारी आँखों की खामोश बाते,
ना जाने कब मुझे समझ आने लगी..!!!

Sunday, 19 March 2017

वो प्यार तुम हो...!!!

मेरी मुस्कराती आँखों की,
वजह तुम हो,
मेरी खनकती चूड़ियों की,
सरगम तुम हो,
मेरी पायलों की,
छ्म-छ्म तुम हो...
ढलती शामो को,
सिंदूरी करते तुम हो...
जागती आँखों का इंतजार लिये,
वो राते तुम हो...
जिन ख्यालो से बढ़ जाती है,
धड़कने मेरी...
वो बाते तुम हो,
दर्पण में जो देखती हूँ...
खुद को यूँ बार-बार...
मेरा वो श्रृंगार तुम हो,
दुनिया को जो दीखता है..
मेरी आँखों में...
वो प्यार तुम हो...!!!

Thursday, 9 March 2017

कभी" और "काश"...!!!

कभी तुम्हारी हथेली से,
अपनी हथेली को जोड़ कर,
चाँद बनाना चाहती थी,
कभी अपने गालो से तुम्हारे गालो पर,
गुलाल लगाना चाहती थी...
सभी ख्वाइशें "कभी" और "काश"
पर आ कर ठहर गयी...
तुम वक़्त कभी निकाल नही पाये,
मैं वक़्त को थामे बैठी रही,
जिंदगी तुम्हारे-मेरे वक़्त से,
बहुत आगे निकल गयी....

खुद को ढूंढोगे...!!!

कभी तुम मुझे अखबारों में ढूंढोगे,
मेरी रची पंक्तियो में,
तुम मेरी सांसे गिनोगे....
मैं कहाँ हूँ,कैसी हूँ...
इन सवालो के जवाब,
पाने को बेचैन रहोगे..
जब मैं लिखती थी सिर्फ,
तुम्हारे लिए तब तुमने कभी पढ़ा नही..
अब जब मेरी रचना आती है अखबारो में,
तुम उनमे खुद को ढूंढोगे...!!!

Saturday, 4 March 2017

वुमेन डे"ना मनाना पड़े...!!!

वूमेन डे....😊
लीजिये ये इक निर्धारित किया गया है,
स्त्री के लिए,कहते है कि,
स्त्रियों के सम्मान के लिए ये दिन चुना गया है...
पर मैं आज तक समझ नही पायी,
कि क्या सच में किसी दिन की जरुरत पड़ती है,
स्त्री को सम्मान देने के लिए..
जो स्त्री सृष्टि को जन्म देती है,
जो खुद आदिशक्ति है..
क्या उसे किसी दिन की जरुरत है..
ये सिर्फ कुछ लोगो ने अपनी,
आत्मसंतुष्टि के लिए,
तीन सौ पैसठ दिन,
जिस स्त्री नजरअंदाज करते है,
उन्होंने इक दिन बना दिया,
और ये जता दिया कि,
हम स्त्री का सम्मान करते है....
और स्त्री ने भी मुस्करा कर,
उनका ये इक दिन का सम्मान रख लेती है....
और पूछती है कि कभी कोई,
"मेन डे"क्यों नही मनाया जाता?
क्यों कि इक स्त्री ने,
पुरुष को हमेसा सम्मान देती है,
पिता के रूप में,भाई के रूप में,पति के रूप में..
उसने सबकी भावनाओ को,
उनके बिना कहे समझा है,
बिना किसी स्वार्थ के,निश्छल,
हर रिश्ते को निभाती है...
तभी तो ये "वूमेन डे"मानाने वालो को,
कभी "मैन डे"की जरुरत नही महसूस की...
आप स्त्री के आत्मसम्मान की बात करते है,
पर आप ये भूल जाते है,
जिस स्त्री ने आपको सम्मान करना सिखाया है,
वो खुद अपने आत्मसम्मान की रक्षा कर सकती है,
और गर कही वो अपना आत्मसम्मान छोड़ती है,
तो इसका अर्थ ये नही कि,
वो कमजोर है,मुर्ख है..
बल्कि वो आपको बहुत प्यार करती है,
रिश्तों को संजोना जानती है...
इस सृष्टि में इक मात्र स्त्री ही है,
जो अपने रिश्तों के लिए,
किसी भी हद तक जा सकती है...
जिस स्त्री ने अपने माथे पर सजा कर,
आपको जो सम्मान दिया है...
उसकी कीमत ये इक दिन"वुमेन डे"
तो नही हो सकता है...
चलिये इस बार कुछ ऐसा करिये,
कोई संकल्प ऐसा लीजिये,
कि आपको किसी भी स्त्री के लिए,
"वुमेन डे"ना मनाना पड़े...

Friday, 24 February 2017

तब तुम मुझे पढ़ना...!!!

जब तुम खुद को बिल्कुल खाली समझना,
जब तुम्हे लगे कि जैसे,
कुछ है ही नही तुम्हारे लिये..
तब तुम मुझे पढ़ना,
मुमकिन है तुम्हे सब कुछ अपना ही सा लगे....
जब तुम्हे लगे कि,
कुछ नही रहा संजोने के लिये,
जब तुम हालातो से मजबूर बिखर जाओ,
तो मुझे पढ़ना...
खुद को मेरे शब्दों में समेट कर,
संजो कर रखा हुआ पाओगे..
जब तुम्हे लगे तुम खुद को,
कही रख कर भूल गए हो,
तो मुझे पढ़ना,
तुम्हारी खुद से मुलाकात हो जायेगी....
तुम खुद को इन पन्नो में  ही कही पाओगे...
जब तुम्हे कुछ बेचैन कर दे,
लगे कुछ अधूरा सा रह गया है,
तब तुम मुझे पढ़ना,
और मेरी लिखी हर रचना के अंत में,
क्रमशः......कुछ लिखा रह गया है...
तुम्हे उन्हें लिख कर पूरा कर देना...
तुम्हे पूर्ण जीवन मिल जएगा...!!!

Monday, 13 February 2017

प्यार महज इक शब्द ही तो था....!!!

प्यार महज इक शब्द ही तो था मेरे लिए,
पर तुमसे मिलने के बाद,
प्यार एहसास बन कर मुझे छू गया....
तुम क्या मिले..
प्यार के हज़ारों रंग मिल गए,सुबह,शाम,चाँद,तारे,बारिश,धुप,छाव...
जैसे हर शै में प्यार ही प्यार हो...
तुमसे जब से मिली,
नजरिये सारे जिंदगी के बदल गये,
बहुत गुमान था मुझे कि,
मैं नही किसी का इन्तजार करुँगी,
बहुत शर्ते लगी थी सखियों में कि,
मैं कभी इस तरह ना किसी से प्यार करूँगी...

तुमने कभी कहा नही पर,
तुम्हारे प्यार में हूँ,
ये बात ना कब दिल में उतर गयी,
तुमसे परे कुछ भी सोचना जैसे,
कोई अपराध लगता है,
तुमने कभी नही जताया,पर ,
इस तरह मुझ पर,
तुम्हारा अधिकार लगने लगा...

इस भीड़ में इक चेहरा कैसे,
इतना खास हो जायेगा,
ये तो सोचा ही नही था...
इस पूरी दुनिया में,
तुम ही मेरी दुनिया बन गये...
जादू ही तो जो इक बार चला तो,
फिर नही उतरा,
बस हद से ज्यादा गुजरता चला गया....

जब तक तुमसे नही मिली थी,
तब तक मैं इक स्त्री आजादी,
उसके स्वाभिमान,उसके आत्मसम्मान,
की बाते करती थी...
बाते आज भी वही है..
तुमसे मिल कर इन शब्द को अर्थ मिल गया,
मैंने जाना कि प्यार में,
इक स्त्री कमजोर नही होती,
समर्पित होती है....
ये समर्पण मैंने तुमसे मिलने के बाद समझा है...

प्यार में होना भी इक कला है,
मंदिरो की घंटियों सा गूंजता है,
तुम्हारा कहा इक-इक शब्द,
मेरे-तुम्हारे रिश्ते को मौली में बांध आती हूँ,
मंदिर की चौखट पर....
तुम्हे अपना सम्मान मान कर,
सजा लेती सिंदूर की तरह अपने मस्तक पर....

प्यार खुद अधूरा होकर भी पूर्ण है...
जिसने इसे महसूस कर लिया,
वो जी रहा है,वो भूल गया खुद को,
किसी के लिए...
मान लिया आधार किसी को जिंदगी के लिए...
प्यार महज इक शब्द ही तो था मेरे लिए...

Sunday, 12 February 2017

फिर वही गुलाबो की महक.. फिर वही माह-ए-फरवरी है... !!!

चुम कर माथा तुम्हारा मैं ले लूँ,
सारी बलाये तुम्हारी,
बांध कर तुम्हारी कलाई प्यार इक धागा,
दे दूँ तुम्हे अपनी दुआएं सारी.....
वक़्क्त रुकता नही ना तुम्हारे लिए,
ना ही मेरे लिए..
क्यों ना कुछ देर ठहर जाये,
इक-दूजे के लिये...
कभी जब घबरा कर,
जो तुम थाम लोगे हथेलियां मेरी,
मैं महसूस कर लुंगी,
तुम्हारे मन की व्यथाएँ सारी..
कि फिर वक़्त मिले ना मिले,
चुम कर आँखे तुम्हारी,
भर दूँ तुम्हारी आँखों में,
आसमान की निहारिकायें सारी...  
फिर वही गुलाबो की महक..
फिर वही माह-ए-फरवरी है... !!!

Saturday, 11 February 2017

फिर वही गुलाबो की महक.. फिर वही माह-ए-फरवरी है... !!!

जब तुम रुठ जाओगे,
मै कुछ नही कहूँगी,
तुम्हे गले से लगा कर मना लुंगी...
जब भी तुम उलझनों से,
परेशान हो कर अकेले,
तन्हा रहना चाहोगे,
मैं कुछ नही कहूँगी,
तुम्हे गले से लगा कर,
तुम्हे अपने होने एहसास दूंगी...
जब सफर तुम्हे लम्बा लगेगा,
तुम बैठोगे जो थक कर कही,
मैं तुम्हे गले से लगा कर,
फिर से चलने को,
तैयार कर दूंगी...
जब भी तुम जिंदगी की,
मुश्किलो से घबरा जाओगे,
मैं तुम्हे गले से लगा कर,
तुम्हे फिर से लड़ने के लिए,
तैयार कर दूंगी..
फिर वही गुलाबो की महक..
फिर वही माह-ए-फरवरी है... !!!

Friday, 10 February 2017

फिर वही गुलाबो की महक.. फिर वही माह-ए-फरवरी है... !!!

तुम मुझसे मुझमे जीने का,
इक वादा दे दो,
मैं दिखूंगी हमेसा तुम्हारी आँखों में,
इक वादा दे दो...
मैं हसूंगी तुम्हारे होठो पर,
इक वादा दे दो...
घड़िया सुख-दुख की सभी,
गुजारँगे साथ-साथ...
इक वादा दे दो..
मुकम्मल जिंदगी होगी,
सिर्फ तुम्हारे साथ...
इक वादा दे दो...
जानती हूँ कि ये कसमे,
वादे सब झूठे है...
इस झूठ पर भी कुछ देर और कर लूँ,
यकीन क्यों ना कोई झूठा वादा दे दो...
भले ही तोड़ देना तुम सारे ही वादे,
पर तोड़ने ही के लिये ही,
इक वादा दे दो...
फिर वही गुलाबो की महक..
फिर वही माह-ए-फरवरी है...!!,
इक वादा दे दो...

Wednesday, 8 February 2017

फिर वही गुलाबो की महक.. फिर वही माह-ए-फरवरी है...!!

ये सात दिन जिंदगी सात,
इंद्रधनुष के रंगों की तरह रहंगे...
कुछ खास हुआ हो या नही,
हम सात दिन साथ थे,
इससे ज्यादा कुछ और,
खास नही होगा...
सात दिनों का साथ,
सात कसमो सा रहा,
सात रातो साथ,
तुम्हारे सात सपने,
हमने निभायी इन सात दिनों में,
साथ-साथ सभी रसमें....
ये साथ दिन हमारे साथ के,
सात फेरो सा रहे,
जिनमे कभी तुम आगे चलते रहे,
कभी मैं दो कदम पीछे हो कर,
तुम्हारी ढाल बनती रही...
ये सात दिन जिंदगी के साथ,
सात जन्मों से रहे,
मैंने तुम्हे जी लिया,
इन सात दिनों में,
सात जन्मों का साथ...
फिर वही गुलाबो की महक..
फिर वही माह-ए-फरवरी है...!!

Tuesday, 7 February 2017

फिर वही गुलाबो की महक.. फिर वही माह-ए-फरवरी है...!!

क्यों ना अपने घुटनों पर बैठ कर,
मुझे अपने साथ जिंदगी के,
सफर पर चलने की फरमाइश करते,
क्यों ना तुम कोई खूबसूरत सी,
अंगूठी मेरी उँगली में पहना कर,
बांध लेते अपने एहसासों से...
क्यों ना तुम कुछ शब्द से सजा के,
कोई खत दे कर...
मुझसे प्यार का इकरार करते...
पर ऐसा तो कुछ भी नही किया तुमने,
आँखों ही आँखों में,
तुमने बाते दिल कि कह दी,
मैंने मान ली तुम्हारे साथ सफर पर,
चलने की फरमाइश...
मैं बंध गयी तुम्हारे एहसासों में,
मैंने पढ़ लिए तुम्हारी आँखों में,
इकरार के सारे खत....
मैंने पढ़ ली तुम्हारी ख़ामोशी भी,
पर तुम मेरे शब्द भी ना पढ़ पाये....
फिर वही गुलाबो की महक..
फिर वही माह-ए-फरवरी है...!!

Monday, 6 February 2017

फिर वही गुलाबो की महक.. फिर वही माह-ए-फरवरी है...!!

मैं तुम्हारे जीवन को गुलाब करना चाहती थी,
कांटे सभी मैं चुन कर,
तुम्हे पंखुड़ियों में सहज कर,
रखना चाहती थी...
मैं सींचती रही,तुम्हारे जीवन के गुलाबो को,
अपने प्यार से...कि खुश्बु बरकरार रहे,
तुम्हारी मेरी सांसो में,
मैं तुमसे इतर कुछ भी नही चाहती थी...
मैं हर रोज कली गुलाब की,
फूल बन कर तुम्हारी बाहों में रहना चाहती थी...
फिर वही गुलाबो की महक..
फिर वही माह-ए-फरवरी है...!!!

Sunday, 5 February 2017

फिर वही गुलाबो की महक.. फिर वही माह-ए-फरवरी है...!!!

तुम्हारा यूँ हर रोज शाम को,
कॉफी पर मुझे बुलाना,
मैं जानती थी कि कहते नही हो,
पर तुम ये मुझसे सुनना चाहते हो,
कि तुमसे मिलना अच्छा लगता है....
और मैं भी हमेशा तुम्हारा,
ये गुरुर बना कर रखना चाहती थी,
तभी तो जब तुम पूछते थे,
क्या कर रही हो,
तो मैं कह देती थी कि बस अभी आती हूँ....
क्यों की तुम्हे मुझसे अपने लिए,
सुनना अच्छा लगता था,
और मुझे तुम्हारी आँखों में,
तुम्हारा सिर्फ और मेरा होने का गुरुर,
अच्छा लगता था....
फिर वही गुलाबो की महक..
फिर वही माह-ए-फरवरी है...!!!

Saturday, 4 February 2017

फिर वही गुलाबो की महक.. फिर वही माह-ए-फरवरी है...!!!

वो सूरज के निकलने से शाम के ढलने तक,
हर पहर की तुमसे बाते करना...
साक्षी है वो चाँद,वो तारे,वो चांदनी..
हमारी वो कसमे,जीने-मरने के वादे करना....
हमने तो सीखा था इक-दूजे की आँखों में,
देख कर यकीन करना...
ना जाने तुमने कहाँ से सीख लिया,
इन्ही आँखों से छल करना....
वो सूरज वो शामें वो पहर,
आज भी ढलते है वैसे ही,
हमने सीख लिया है,
इनसे..इक-दूजे के लिए,
यूँ ही बेवजह तुम संग चलना....
फिर वही गुलाबो की महक..
फिर वही माह-ए-फरवरी है...!!!

Friday, 3 February 2017

फिर वही गुलाबो की महक.. फिर वही माह-ए-फरवरी है...!!!

तेरा यूँ हक़ से
मुझ पर हक़ जताना
मुझ पर तुम्हारे सारे
अधिकार से लगते हैं
कितना अजीब पर प्यारा है
यूँ आँखों से सब कुछ कह देना
और होठो से ना बताना
जैसे आसमां का हक़ धरती पर
जैसे पानी का हक़ समुन्दर पर
जैसे खुशबू का हक़ फूलों पर
जैसे इश्क़ का हक़ दिल पर
सब खामोश होकर
एक दूसरे से मिलते हैं
और हक़ जताते हैं
हमारे तुम्हारे तरह
बिना एक दूसरे से कुछ मांगे...
फिर वही गुलाबो की महक...
फिर वही माह-ए-फरवरी है...!!!

Thursday, 2 February 2017

फिर वही गुलाबो की महक... फिर वही माह-ए-फरवरी है...!!!

तुम्हारे-मेरे बीच रिश्ता
कच्चे धागे से बंधा था,
मैंने अपने प्यार और समर्पण से
इसे पक्की मौली बना दिया,
तुम खींचते रहे कितना पर
मेरे हर सजदे से
मेरी प्रार्थना से
ये मजबूत होता गया.
तुम शायद
इसे कभी नहीं समझ पाओगे
क्योंकि तुमने दिल में रखे थे
रुई की फोहों से सपने
और मैं रखी था कपास के बीच
जिसके बीड़वे कल पौधे बनेंगे
और उस कपास से सूत काट काट कर
फिर नए रिश्तों की मजबूत बंधन बाँधे जायेंगे..
फिर वही गुलाबो की महक...
फिर वही माह-ए-फरवरी है...

Wednesday, 1 February 2017

फिर वही गुलाबो के महक...फिर वही फरवरी है....!!!

जब तुम्हारा दर्द मेरी आँखों से बहने लगा,
तब लगा सिर्फ दिल ही नही,
मन भी जुड़ गया है तुमसे...
और जब चंचल मन,
दौड़ता-भागता मन,
कही किसी पर ठहर जाये तो,
बात सिर्फ दिल से दिल की नही रह जाती,
जिंदगी  से साँसों की,और
साँसों की तुमसे हो जाती है..
मेरी साँसों में तुम्हारी खुश्बु बिखरी,
कि फिर वही माह-ए-फरवरी है...

Tuesday, 31 January 2017

फिर वही गुलाबो के महक..फिर वही फरवरी है..!!!

वही बचपन का प्यार,
वही गुलाबो का इकरार...
किसी को ढूंढती हमारी आँखों की कशिश,
वही सिद्दत कि मिल जाये कोई,
तो न्योछावर जन्मो का प्यार...
बचपना ही तो था,पागलपन था,
पर बहुत खूबसूरत किसी के ना होने,
पर उसके मिल जाने का इंतजार...
फिर वही गुलाबो की महक है,
फिर वही आँखों की कशिश है...
फिर वही फरवरी है....!!!

Monday, 23 January 2017

मेरे शब्द भी तो तुमसे ही है....!!!

आखिर तुमने आज कह ही दिया,
कि तुम मुझे क्यों लिखती हूँ,
मैंने पूछा फिर क्या लिखूं...
तुमने कहा...
तुम देखो तुम्हारे आस-पास,
बहुत कुछ है लिखने को.... सूरज,चाँद,तारे,फूल,बारिश,शामें,राते...
सब कुछ तो तुम्हारे लिए इनको लिखो...
मैं हँस पड़ी....
मेरा तो सब कुछ तुमसे ही है...
तुम हो तो मुझे....
दिन,रात,पहर,शामें महसूस होते है...
जो तुम नही तो,
बारिश तो होती है, पर मुझे भिगोती नही है...
कैसे लिख दूँ....
तुमसे परे कुछ भी...
कि मेरे शब्द भी तो तुमसे ही है....!!!

Thursday, 19 January 2017

झरते गुलमोहर.....

उस रोज बगीचे में...
गुलमोहर के पेड़ के नीचे,
जब तुम अपना सर मेरी गोद में,
रख कर लेटे  ना जाने आसमान में,
गुम कुछ ढूंढ रहे थे...
तब मैं जमी पर अपनी,
इक छोटी सी दुनिया की,
तस्वीर खीच रही थी...
जब तुम उस पल अपनी मंजिले,
अपने सफर,अपने सपने देख रहे थे..
तब ही मैं हम पर झरते,
उन गुलमोहर के फूलों को,
शुक्रिया कर कह रही थी...
जब तुम आसमान की उच्चाईयां छूने को,
सीढ़ियां बना रहे थे,
तब ही मैं तुम पर छुक कर तुम्हारे मस्तक पर,
अपने होठो का स्पर्श दे कर,
आसमान में उड़ रही थी...
तभी तुम अचानक से उठे,
और कहने लगे बहुत हो गया,
अब मैं चलता हूँ,और भी काम है...
तुम इस तरह कहते देख ,
मैं कुछ नही कह पायी,
क्या कहती कि...
गर तुम यूँ ही...
मेरी गोद में लेटे रहते तो,
मुझे जिंदगी से और,
कुछ चाईए ही नही था..
फिर तुम अपनी मंजिलो,
की तरफ बढ़ गए,
और मैं हम पर झरते गुलमोहर के,
फूलों को समेटती रही,
क्यों मेरे पास,
तुम्हे संजोने से जरुरी,
कोई काम नही था......!!!

Monday, 9 January 2017

'आहुति"लिखती है...!!!

मैंने आज खुद को किताबो के,
बाजार में देखा,
मोल मिल गया उन शब्दों को,
जो मेरे लिए अनमोल थे,
सभी पढ़ रहे है तुमको,
इक सिवा तुम्हारे,सभी जानते है,
तुमको,इक तुम्ही अंजान रहे...
मेरे इक-इक शब्द में,
इक-इक पंक्ति में,
सभी अपने प्रिय की,
तस्वीर खीचते है,
जो सिर्फ और सिर्फ,
तुम्हारे लिए थी,उन रचनाओं को,
सभी अपनी-अपनी पंक्ति मानते है...
मैं अब मैं ना रही,
मुझे अब कहाँ लोग,
पहचानते है,तुमको ही पढ़ते है,
तुम्ही से अब मुझे,
सभी जानते है...
कभी फुरसत हो,
तो पूछ लेना किसी से "आहुति"को..
कह देंगे वो भी,
कि वो भी खूब है
वो जिसे "आहुति"लिखती है...!!!

Wednesday, 4 January 2017

आज तक सफर में हूँ...!!!

इक नदी जब चलती है,
तो सागर में गिरेगी यही,
उसकी नियति होती है,
सागर ही उसकी मंजिल होती है...
यही पढ़ती आयी थी,देखती आयी हूँ...
मुझे मंजिल नही मिली....क्यों कि,
मैं चली तो नदी की तरह ही थी,
पर सागर में मैं गिरी नही,
सागर के साथ चलना तय किया....
कि आज तक सफर में हूँ...!!!

Sunday, 1 January 2017

कुछ बिखरी पंखुड़ियां.....!!! भाग-33

301.
कविता मैं लिख दूंगी कहानी
तुम लिख लेना..
मैं तुम्हारे लम्हो को जी लुंगी,
तुम मेरी जिंदगी जी लेना..

302.
मैं तो पूरी दुनिया को,
शब्दों में बांध लुंगी,
अगर तुम मुझे पढ़ने की ठान लो....

303.
मुझमे तुम में सिर्फ इतना फर्क है,
मैंने तुम्हे उम्मीदों से बंधा है,
तुमने मुझे शर्तो से बांधा है.....

304.
कभी-कभी यूँ ही जिन्दगी की.
हर बात अच्छी लगती है.....
जानते हो क्यों.....
क्यों की तुम अच्छे लगते हो....

305.
इतना भी मुश्किल नही था,
सब कुछ आसान कर देना,
जितना आसान था तुम्हारे लिये,
आसान को मुश्किल कर देना.....

306.
मैं कब से उन शब्दों का,
इन्तजार कर रही हूं,
जिन्हें मैं लिखूं भी नही...
और तुम मेरे मौन में पढ़ लो...

307.
जब से तुमसे मिली...
मैं प्रेम को लिखने लगी...
जब तुम्हारी आखों की,
गहराईयों में उतरी तो...
अंतहीन..अद्रश्य...
प्रेम को मैं लिखने लगी..

308.
मुझसे अभी तक यूँ ही,
बहुत कुछ लिख़ गया है....
तुम्हे लिखते-लिखते......

309.
नही पता कि ये लगाव,
ये अपनापन क्या होता है,
पर जब-जब तुम्हारा,
दिल धड़कता है,
मुझे मेरे होने का एहसास होता है....

310.
अपनी तलाश पर निकलूं,
भी तो क्या फायदा...
तुम बदल गये हो...
खो गये होते तो...
कुछ और बात होती...

कुछ बिखरी पंखुड़ियां.....!!! भाग-32

291.
फिर इक बार.....
मैं शब्दों को गढ़ लूँ,
कि शब्द अब मिलते नही मुझे...
तुम जो पढ़ लो इक बार,
तो....मैं फिर कविता बन जाऊं..

292.
मुझे सुकून है कि,
मैंने हर मुमकिन कोशिश की,
तुम्हे रोकने की....
तुम पछताओगे कि,
तुम ठहरे क्यों नही...

293.
तुम क्या समझोगे प्यार क्या होता है,
जहां दिल की चलती है,
वहां तुम दिमाग चलाते हो...

294.
मैं तो हर दिन तुम्हारे लिये,
करवाचौथ रहती आई हूँ...
सुना है उम्र बढती है...
इसके व्रत रखने से...
मैं तो हर पल अपनी साँसों क,
तुम्हारी सांसो से जोडती आयी हूँ...
अब भी क्या कोई रस्म,
अदा करनी पड़ेगी..........!

295.
मेरा तुम्हारे साथ होना मेरी मर्जी है,
गर तुमने मेरी मज़बूरी समझ लिया
ये तुम्हारी ग़लतफ़हमी है....

296.
अपना धड़कता दिल,
तुम्हारे सीने में,
छोड़ आयी हूँ...
तुम्हारे होटों पर निशानी अपनी,
मुस्कराहटो की छोड़ आयी हूँ...
सभी पढ़ लेंगे अब तुम्हारी आखों में...
कहानी अपनी उनमे छोड़ आयी हूँ....

297.
कभी मैं प्यार के लिये,
लिखा करती थी,
अब लिखने के लिये,
प्यार लिखती हूँ...

298.
इक शाम मेरी धड़कनो की,
तुम्हारी धड़कनो से बात हो...
ना लबों को हो इजाज़त,
कुछ कहने की..
सिर्फ इशारो में...
जाहिर जज्बात हो..
बस यूँ ही....इक शाम..
तुम्हारे साथ हो..

299.
किसी का साथ पसंद है तो फिर,
ये नही देखा जाता की साथ कितनी देर का है.....
देखा तो बस इतना जाता है,
की दो पल भी अगर साथ है....
तो मुकम्मल साथ रहे......!!

कुछ बिखरी पंखुड़ियां.....!!! भाग-31

281.
नही याद की उसके साथ पी थी,
चाय और कॉफ़ी का स्वाद क्या था...
सिर्फ ये याद रह गया....
कि उस शख्स की आखों में क्या-क्या था..

282.
मैं चाहती हूँ इक चांदनी रात,
जो सिर्फ मेरी और तुम्हारी हो...
हो चांदनी कुछ नाराज चाँद से,
उस रात चांदनी सिर्फ हमारी हो.....

283.
कितना कुछ हो जाता है,दुनिया में यूँ ही बेवजह....
फिर तुम्हे मेरा बनने में क्यों चाइये कोई वजह...

284.
कितना इतराते हो,
तुम मेरी रचनाओं को पढ़ कर,
इस एहसास से की,
मेरे सारे शब्द सिर्फ तुम्हारे है...
तब मैं भी थोड़ा इतरा लेती हूँ,
तुमको अपने शब्दों में गढ़ कर,.....

285.
ढलती शामे,चाँद,तारे,राते,चाँदनी..
साँसे,अहसास,दिल,धड़कन...
सौं बातों का इक ही मतलब ...
सिर्फ तुम...और तुम ही तुम..

286.
तुम्हारी आँखों की बाते,
तुमसे ही कह देती हूँ...
तुम हँस कर पढ़ कर लेते हो,
मैं मुस्करा कर तमको ही लिख देती हूँ...

287.
तेरी बातो से मेरी..
हर इक रचना रच जाती है...
कविता तो मैं लिखती हूँ...
कविता जैसी बाते..
तुमको आती है..

288.
इक पूरी जिंदगी गुजार दी हमने,
इक अच्छी जिंदगी,
जीने की तैयारी में......

289.
रात भर दिये की रौशनी लिये,
तुम्हारी राहो में तुम्हारी राह तकती रही...
ना दिये को बुझने दिया,
बाती संग मैं भी जलती रही...

290.
इक लम्हा तेरी नजरो में मैं ठहर जाऊं,
इक लम्हा मेरी साँसों से गुजर जाये....
बस इन्ही दो लम्हो में,
हमारी जिंदगी गुजर जाये...

कुछ बिखरी पंखुड़ियां.....!!! भाग-30

270.
तुम रहने दो मेरे मन को बहलाने को,
तुम बिन ही....
मैंने मन को मना लिया है..

271.
उसके हाथो की गिरिफ्त ढीली,
पड़ी तो महसूस हुआ...
यही वो जगह है..
जहाँ रास्ता बदलना है...

271.
गुस्ताखियां भी आपकी
नाराजगिया भी आपकी...
गज़ब अंदाज़ है....
आपकी चाहत के...........

272.
प्यार,एहसास,उम्मीद....जीवन विश्वास...
कुछ यूँ हो तुम मेरे आस-पास...
इक खत में लिखूं...
क्या-क्या दिल की बात..

273.
इन लम्हो को कैद करके,
कुछ तो आसान कर ली है जिंदगी.....!!!

274.
हमने जिंदगी को,खुद को,
कोई विकल्प नही दिया,
तुम हो तो हो...
नही तो कुछ नही चाहिए...
जिंदगी से....

275.
तुम्हारी मुस्कराहटे....
मेरी दम तोड़ती जिन्दगी में.....
साँसों का काम करती है....

276.
तुम्हारे हर झूठ को,
मैं सच मान लेती हूँ,
झूठ के पीछे का भी,
सच जान लेती हूँ...
जब तुम सोचते हो कि,
तुमने मुझे झूठ से बहला दिया,
उस पल मैं तुम्हारे लिए,
सिर्फ तुम्हारे लिए....
खुद को पागल मान लेती हूँ..

277.
तेरी कायनात में ए-खुदा,
कही भी मेरा दिल लगा नही......
मेरे दिल को जो तस्सलिया दे....
ऐसा कोई मिला नही.... .......!!

278.
जब तुम पढ़ लेते हो मुझको,
मैं शब्दो से निकल कर,
सज जाती हूँ तुम्हारे होठो पर...

279.
एक नाम जिस में हमारी,
पूरी दुनिया सिमट जाती है.....
जिसकी एक ख़ुशी के लिए,
हम कुछ भी करने को,
तैयार रहते है....
जिसके इक इशारे पर,
हम पूरी दुनिया,
जीत कर उसके कदमो में,
ला सकते है...
आखिर हम उसी से क्यों,
हार जाते है..... !!

280.
कभी तुम्हारी बातो से बुनी थी,
जो कहानी...पुरी हो ना हो...
तुम्हारी मुस्कराहटों से,
पुरी जिंदगी हो जायेगी..
मेरी आँखों से शुरू तुम्हारी,
आँखों पर खत्म..
ये कहानी मेरे शब्दो में,
सदियों तक पढ़ी जायेगी..