Saturday, 24 June 2017

जब सफर पर मैं रहती हूँ...!!!

तुम्हारे साथ जब मैं चलती हूँ,
राहे कहाँ याद रहती है मुझे,
गालिया भी मैं भूल जाती हूँ..
निगाहे तो सिर्फ अपनी,
मंजिल पर यानि,
तुम पर ठहरी रहती है..
किन राहो से पहुँची हूँ,
इसकी परवाह कहाँ करती हूँ....
तुम्हारे साथ जब सफर पर मैं रहती हूँ...

Friday, 23 June 2017

यूँ ही इक पल की कहानी.....!!!


उस दिन जब मैं तुमसे नाराज हो रही थी की तुमको इतने काल की तो जवाब क्यों नही दिया,कितनी इमरजेंसी थी पता है तुमको....और तुमने बहुत बेबाकी से मुझसे कहाँ पचास बार फोन करोगी,तो इमरजेंसी में भी नही उठेगा...मैं तो जैसी अवाक् सी रही गयी तुम्हारे इस जवाब से,सोच में पड़ गयी की मैं कौन हूँ तुम्हारे लिए...उस दिन जिंदगी का इक बहुत बड़ा सबक तुमने मुझे दिया था,कि फ़ोन कौन कर रहा है वो अहमियत नही रखता,कितनी बार किया गया बस ये जरुरी है....मैं कितनी पीछे थी तुम्हारी इस सोच से तुम कितने आगे थे मुझसे...तभी मुझे याद आया मेरी इक सहेली जो तभी किसी को काल करती है जब उसको जरुरत होती है,वो कुछ भी नही कर रही होती है फिर भी कहती है बहुत बिजी हूँ...वो कहती है कि किसी को अपना वक़्त दो तो ये जताओ की कितनी मुश्किल से तुमने उसके लिए वक़्क्त निकाला है...तब तो तुम्हारी कोई अहमियत होगी,नही तो सामने वाला तुम्हे बेवकूफ समझेगा...मैंने भी तो कभी तुम्हे ये नही जताया कि मैं तुम्हारे लिए वक़्त बड़ी मुश्किल से निकाला है,बल्कि मेरा तो सारा वक़्क्त ही तुम्हारे लिए था...मैं कभी तुम्हे मना कर ही नही पायी...या यूँ कहो की जिंदगी में मैंने तुम्हे सबसे पहले रखा,तुम्हारे लिए ही वक़्त,तुमसे ही हर बात...मैंने तो बारिश की बूंदों की बात हो,या चांदनी रात हो..सबके बारे में तुमसे ही बात की...पर मुझे नही पता था,प्यार में दिमाग से काम लेना होता..
#यूँहीइकपलकीकहानी#

Monday, 19 June 2017

मेरी और तुम्हारी...!!!

हर कोई पढ़ लेता है आँखे,
मेरी और तुम्हारी...
हम बताये या ना बताये,
लोग खुद ही कितने किस्से गढ़ लेते है...
मेरे और तुम्हारे....
हम मुस्करा भी दे,
गर इक-दूजे को देख कर,
कितने कहकहे बना लेते है..
मेरे और तुम्हारे...
मैं कुछ लिख भी दूँ,
तो मेरे शब्दों में अंदाज़ तुम्हारे पढ़ लेते है...
मैं लिखती तो सिर्फ कविता हूँ,
उनमे लोग कहानियां गढ़ लेते...
मेरी और तुम्हारी....

Sunday, 21 May 2017

तुम्हारे साथ जिनसे मुझे प्यार हो गया...!!!

चलो इक बार फिर,
तुम मुझे कॉफी पर बुलाओ,
और हमेशा की ना करते हुए हाँ कर दूँ....
तुम्हारा कॉफी पर बुलाना,
इक बहाना था,
गुजरे पलो को दोहराना होता है...
तुम वही शर्ट पहन कर आओ,
जिसे कभी मैंने कहा था,
कि तुम पर अच्छी लगती है...
मैं वही रंग पहन कर आऊं,
जो तुमको बहुत पसंद था..
हम इस तरह इक-दूसरे को,
देख कर मुस्करा दिए,कि
याद तो अभी भी हमें सब कुछ है....
ना जाने क्यों तुम्हारे साथ जब भी होती हूँ,
सालो बाद भी कैपिचीनो कॉफ़ी का,
स्वाद वही होता है...
वही मिठास तुम्हारी बातो की लगती है,
और थोड़ी सख्त तुम्हारे अंदाज़ जैसी होती है...
पर इक बात मुझे आज तक,
समझ नही आई...
वैसे फोन पर तो तुमसे बहुत बाते करती हूँ,
पर जब तुम सामने होते हो,
जाने क्यों कुछ सूझता ही नही..
जैसे ही नजरो से नजरे मिल जाती,
धड़कने बढ़ जाती और,
मैं सब कुछ भूल जाती हूँ...
और तुम मुझे चिढ़ाते हुऐ कहते हो,
अब बताओ तुम्हे कितनी बाते करनी है.....
मैं सिर्फ मुस्करा कर रह जाती हूँ,
कैसे कहूँ तुम्हारा मेरे सामने होना ही,
सारी बातों का मतलब होता है....
सच कहूं तो ये कॉफी मुझे नही पसंद...
बस तुम्हारे साथ ही कॉफी पीती हूँ...
यही वो लम्हे है...
तुम्हारे साथ जिनसे मुझे प्यार हो गया...!!!

Friday, 19 May 2017

कुछ बिखरी पंखुड़ियां.....!!! भाग-41

381.
मुझमे तुम में सिर्फ इतना फर्क है,
मैंने तुम्हे उम्मीदों से बंधा है,
तुमने मुझे शर्तो से बांधा है.....

382.
कभी-कभी यूँ ही जिन्दगी की हर बात अच्छी लगती है.....
जानते हो क्यों.....क्यों की तुम अच्छे लगते हो....

383.
मैं कब से उन शब्दों का इन्तजार कर रही हूं,
जिन्हें मैं लिखूं भी नही...और तुम मेरे मौन में पढ़ लो...

384.
मुझसे अभी तक यूँ ही,
बहुत कुछ लिख़ गया है....
तुम्हे लिखते-लिखते......

385.
अब तुम्हारे बिना,
आसान सफर भी मुश्किल लगता है...
तुम साथ होते हो तो,
समंदर का भंवर भी साहिल लगता है...

386.
नही पता कि ये लगाव ये अपनापन क्या होता है,
पर जब-जब तुम्हारा दिल धड़कता है,
मुझे मेरे होने का एहसास होता है....

387.
क्यों लगता है कि तुम होते सब अच्छा होता...
या यूँ कहूँ की तुम होते तो...
सब अच्छा लगने लगता...

388.
अपनी तलाश पर निकलूं भी तो क्या फायदा...
तुम बदल गये हो...खो गये होते तो...
कुछ और बात होती....

389.
मैं ख़ामोशी से कुछ लिख दूंगी,तुम भी चुपके से पढ़ लेना..

390.
तुम्हारी आँखों की वो अनकही बात थी,
जो मुझे तुमसे दूर जाने नही देती...
तुम्हारी बातो की वो बेरुखी थी,
जो मुझे तुम्हारे पास आने नही देती....

391.
कविता कहाँ किसी की होती है..
जो जैसे पढ़ता है..
इसको ये तो वैसे ही..
उसी की होती है.....

392.
चाहती हूँ मैं कि अपनी हर नज़म.. हर पंक्ति तुम्हारे नाम लिख दूँ...चाहती तो मैं ये भी हूँ कि जब जिक्र प्यार का हो तो....
प्यार मिटा कर तुम्हारा नाम लिख दूँ...

393.
मैं तुम्हारे साथ हमेशा रहूंगी...हर हाल में...
तुम नही भी चाहोगे, तब भी......

394.
मैं बहुत बड़ी writter बनना चाहती हूँ.....
शर्त ये कि.....तुम उसकी वजह बन जाओ....

395.
मैं तुम्हे तलाश करूँ...
और तुम मुझे मिल जाओ...
इतनी तो आसान नही जिन्दगी....

396.
तुम यूँ ही ख़ामोशी से मुझे सुनते रहो,
तो यकिनन मैं इक दिन...
कुछ मुक्कमल लिख ही दूंगी....

397.
तुम्हे पता है मैं कोई कविता-सविता नही लिखती हुँ..
मैं तो वो लिखती हूँ....जो तुम कह नही पाते हो....

कुछ बिखरी पंखुड़ियां.....!!! भाग-40

371.
इक लम्हा तेरी नजरो में मैं ठहर जाऊं,
इक लम्हा मेरी साँसों से गुजर जाये....
बस इन्ही दो लम्हो में,
हमारी जिंदगी गुजर जाये...

372.
फिर इक बार.....
मैं शब्दों को गढ़ लूँ,
कि शब्द अब मिलते नही मुझे...
तुम जो पढ़ लो इक बार,
तो....मैं फिर कविता बन जाऊं..

373.
मुझे सुकून है कि मैंने हर मुमकिन कोशिश की,
तुम्हे रोकने की....तुम पछताओगे कि,
तुम ठहरे क्यों नही...

374.
तुम क्या समझोगे प्यार क्या होता है,
जहां दिल की चलती है,
वहां तुम दिमाग चलाते हो....

375.
मेरा तुम्हारे साथ होना मेरी मर्जी है,
गर तुमने मेरी मज़बूरी समझ लिया
ये तुम्हारी ग़लतफ़हमी है....

376.
कभी मैं प्यार के लिये लिखा करती थी,
अब लिखने के लिये प्यार लिखती हूँ...

377.
किसी का साथ पसंद है तो फिर,
ये नही देखा जाता की साथ कितनी देर का है.....
देखा तो बस इतना जाता है,
की दो पल भी अगर साथ है....
तो मुकम्मल साथ रहे......!!

378.
जब कभी जो कही मैं डर जाऊं...
या हार के टूटने लगूं..तुम मेरा हाथ अपने हाथो में मजबूती से पकड़ कर रखना...यक़ीनन मैं टूट भी गयी तो..कभी बिखारुंगी नही....

379.
कविता मैं लिख दूंगी कहानी तुम लिख लेना..
मैं तुम्हारे लम्हो को जी लुंगी,
तुम मेरी जिंदगी जी लेना...

380.
मैं तो पूरी दुनिया को शब्दों में बांध लुंगी,
अगर तुम मुझे पढ़ने की ठान लो....

कुछ बिखरी पंखुड़ियां.....!!! भाग-39

361.
तुम्हारे हर झूठ को मैं सच मान लेती हूँ,
झूठ के पीछे का भी सच जान लेती हूँ..
.जब तुम सोचते हो कि तुमने मुझे झूठ से बहला दिया,
उस पल मैं तुम्हारे लिए सिर्फ तुम्हारे लिए....
खुद को पागल मान लेती हूँ...

362.
हर बार यूँ ही मुस्करा कर मिली हूँ....तुमसे,
डर था कही.....तुम चेहरे पर उदासी ना पढ़ लो...

363.
जब तुम पढ़ लेते हो मुझको,
मैं शब्दो से निकल कर,सज जाती हूँ तुम्हारे होठो पर....

364.
नही याद की उसके साथ पी थी,
चाय और कॉफ़ी का स्वाद क्या था...
सिर्फ ये याद रह गया....
कि उस शख्स की आखों में क्या-क्या था.

365.
मैं चाहती हूँ इक चांदनी रात,
जो सिर्फ मेरी और तुम्हारी हो...
हो चांदनी कुछ नाराज चाँद से,
उस रात चांदनी सिर्फ हमारी हो..

366.
कितना कुछ हो जाता है,दुनिया में यूँ ही बेवजह....
फिर तुम्हे मेरा बनने में क्यों चाइये कोई वजह...

367.
ढलती शामे,चाँद,तारे,राते,चाँदनी..
साँसे,अहसास,दिल,धड़कन...
सौं बातों का इक ही मतलब ...
सिर्फ तुम...और तुम ही तुम..

368.
तेरी बातो से मेरी..
हर इक रचना रच जाती है...
कविता तो मैं लिखती हूँ...
कविता जैसी बाते..
तुमको आती है...

369.
इक पूरी जिंदगी गुजार दी हमने,
इक अच्छी जिंदगी,
जीने की तैयारी में......

370.
रात भर दिये की रौशनी लिये,
तुम्हारी राहो में तुम्हारी राह तकती रही...
ना दिये को बुझने दिया,
बाती संग मैं भी जलती रही...

कुछ बिखरी पंखुड़ियां.....!!! भाग-38

351.
लगता है की जीवन यही है.....
बस यही है.......एक सपना...और
एक डर.....उस सपने के टूटने का.......

352.
चाहती हूँ...कि मैं इस कदर तुम्हारे ख्यालों में आऊ...
तुम पढ़ो किसी भी किताब को..
मैं हर अक्षर में उभर जाऊं..

353.
किसी की गलतियां बता कर,
उसे छोड़ देना बहुत आसान है....
पर उन गलतियों की वजह जान कर,
उसे माफ़ करना इतना भी मुशकिल नही है...

354.
तुम रहने दो मेरे मन को बहलाने को,
तुम बिन ही....
मैंने मन को मना लिया है....

355.
उसके हाथो की गिरिफ्त ढीली पड़ी तो महसूस हुआ...
यही वो जगह है..जहाँ रास्ता बदलना है...

356.
गुस्ताखियां भी आपकी
नाराजगिया भी आपकी...
गज़ब अंदाज़ है....
आपकी चाहत के........

357.
मैं खुबसूरत हूँ या नही.. ये नही जानती....यक़ीनन वो आखेँ बहुत खुबसूरत है....जिन्हें मैं खुबसूरत लगती हूँ....

358.
इन लम्हो को कैद करके,कुछ तो आसान कर ली है जिंदगी.....!!!

359.
इक चोट से कांच कि तरह टूट कर बिखरी है जिंदगी....
जब भी टुकड़ो को समेट कर जोड़ने कि कोशिश की,
इक और चोट देती है जिंदगी.....

360.
तुम्हारी मुस्कराहटे....
मेरी दम तोड़ती जिन्दगी में.....
साँसों का काम करती है....

कुछ बिखरी पंखुड़ियां.....!!! भाग-37

341.
बहुत डर लगता है जिस बात के लिए,
तुमसे दूर चली आयी थी,
वही बात फिर ना हो जाये....
तुम मिलो और मुस्करा दो,
और मुझे फिर से तुमसे प्यार ना जाये.

342.
जब नजदीकियाँ अखरने लगे,
तो नजदीकियाँ बनी रहे....
इसलिए दूरियां बढ़ा लेनी चाइये....

343.
जब से तुमने मेरा थामा है...
मैं तेज और तेज चलने लगी हूँ...
तारीखों में तो साल आज गुजर रहा है..
मेरी जिन्दगी में हर इक पल में,
सदियां गुजर गयी है....

344.
क्यों ना फिर तुम्हारा हाथ थाम कर इस धुंध में खो जाऊं.....

345.
कही कोई वक़्त से लम्हे,
चुरा कर तुम्हे दे दूंगी,
तुम सिर्फ मुस्करा देना..
मैं तुमसे कानो में कुछ कह दूंगी....

346.
अपनी उदासियों से भागती रही हूँ मैं.....
एक ख्वाब कि तलाश में....
कितनी रातो से जागती रही हूँ मैं....!!

347.
तुम्हारे लिये जो सिर्फ जिन्दगी के कुछ पल थे....
मेरे लिये उन पलों में ही जिन्दगी थी..

348.
मैं तब किसी रियासत की रानी,
जैसा महसूस करती हूँ,
जब तुम कहते हो की,
मैं तुम्हारे दिल में राज करती हूँ...

349.
क्यों कोई तुमने प्यार का नाम नही दिया मुझे,
क्या मैं तुम्हे इतनी प्यारी ना लगी....

350.
ना जाने क्यों तुम हो फिर भी कुछ कमी सी है,
जिंदगी तो तुम्हारे साथ ही है....
ना जाने क्यों लगता है जिंदगी छली सी है...

कुछ बिखरी पंखुड़ियां.....!!! भाग-36

331.
मैं जब भी उदास दिखूं,
तुम कुछ ना करना,
सिर्फ थोड़ा सा मुस्करा देना....

332.
सभी मंजिले तुम्हारी ही है...
मुझे तो सिर्फ तुमको
उन तक पहुँचाने रास्ते बनाने है....

333.
कुछ 'लकीरे' किस्मत से चुराई है....तुम्हारे लिए...
तुम कहो तो तुम्हारी हथेलियों पर....सजा दूँ .....

334.
तुम्हे खूब आता है.....
मुझे अपनी बातो में बहला लेना......
तुम्हे खूब आता है.......
बिना कुछ कहे.... मुझको मना लेना....

335.
मैं लेखिका तो नही हूँ,
हाँ पर लिख देती हूँ वो सब,
जो मैं तुमसे कह नही पाती हूँ...

336.
मैंने अपने पर काट लिए,क्यों की
मैं तुम्हे आसमान की उच्चाईयां,
छूते देखना चाहती हूँ....

337.
अब मैंने भी मन को मारना सीख लिया है....
अब मैं भी मन के की मन नही सुनती हूँ,
मन को समझाना सीख लिया है.....

338.
कुछ भी तो गुजरता नही....
दिल के किसी कोने में ठहर जाता है...
याद बनकर..
क्या खोया ? क्या पाया ?...
इस गुजरे वक़्त में आ गया....
नया साल एक जवाब है....
सामने सवाल बनकर......

339.
कुछ नही कहूँगी,सिर्फ तुम्हारे साथ जब होती हूँ,
हर पल नया,हर तारीख नयी,हर साल नया होता है....

340.
कुछ कहूँगी फिर भी कम ही होगा,
तुम्हे देख कर ग़र मुस्करा,
कर आँखे झुका लूँ,
तो समझ लेना...
जो मैंने कहा नही...

कुछ बिखरी पंखुड़ियां.....!!! भाग-35

321.
आओ तुम्हे पढ़ लूँ इस बार जी भर कर मैं,
कि कभी अधूरा सा ना बाकी रहे..

322.
मेरी पंक्तियों को पढ़ कर,
जितना आसान था तुम्हारे लिय,
खामोश होना,उतना ही मुश्किल था,
मेरे लिये, तुम्हे लिखना....

323.
प्यार इक भगवान् की पूजा करने जैसा ही पवित्र है,
और ये एहसास कभी यूँ अचानक तुम्हारी आँखों में दिख जाता है...

324.
मेरे हाथो को अपने हाथो में थाम लो...
तो फिर किसी वादे की मुझे जरुरत नही......

325.
जिंदगी में हारते नही है,हमको हरा दिया जाता है,
और हराता वही है,जिसके लिए हम जितना चाहते है...

326.
नही चाहती कि तुम मेरे लिये आसमान के,
तारे तोड़ कर लाओ,शर्त ये है कि
तुम थाम लो हाथ मेरा,
तारे मैं खुद तोड़ लाऊंगी..

327.
इक स्त्री जब प्यार में होती है तो,
वो अपने प्यार के लिए.
जब रोटी भी सेंकती है,
और अगर वो थोड़ी सख्त हो जाये तो,
वो हटा देती है,दूसरी बना कर देती है,
क्यों की वो मानती हैं कि,
जिंदगी सख्तियां सिर्फ वो सह सकती है...
अपने प्यार को तो सिर्फ प्यार ही देना चाहती है...
फिर ना जाने कैसे,
पुरुष उसके लिए इतने सख्त फैसले ले लेते है..

328.
मुझे अब कविता में जिंदगी नही ढूंढनी,
जिंदगी को कविता बनाना है..

329.
गर ये आँखे जागती रहेंगी,
तो इन्हें तुम्हारा इन्तजार रहेगा...
चलो इन्हें कुछ और सुझाया जाये,
झूठ ही कह कर कि,
तुम सपनो में आओगे,
इन्हें सुलाया जाये....

330.
प्यार न करने से अच्छा है.....?
किसी से प्यार करके .......
उसके प्यार में हार जाना है..

कुछ बिखरी पंखुड़ियां.....!!! भाग-34

311.
मैंने सम्हाल रखे है,
तुम्हारे कुछ लम्हे,
कभी जरुरत हो..
तो वापस ले लेना...

312.
वो मेरे इतने करीब से हो कर गुजरा है...
उसके जाने के बाद भी...
मेरे आस-पास..इक अरसे तक,
उसका एहसास बिखरा रहा...

313.
सभी रंग तुम्हारे है...
मैं तो हर रंग में तुम्हारी हूँ....

314.
मेरे नाम का गुलाल,अबीर..
तुम भी अपने गालो पर लगा लेना,
कोई पूछे तो झिझकना नही,
नाम मेरा बता देना....

315.
इक बार जो तुम्हारे प्यार का रंग चढ़ा,
फिर और कोई रंग ना चढ़ सका...

316.
इक स्त्री तुम्हारी आँखों में,
अपने लिये सम्मान और होठो पर,
मुस्कान ही तो चाहती है...

317.
प्यार के लिये मैंने सिर्फ प्यार ही शर्त रखी है....

318.
जहाँ प्यार होता है...
वहां नारजगी नही होती है.....
सिर्फ उम्मीद होती....

319.
मैं कैसे कह दूँ...कि उसने मुझे भुला दिया...
कि उसकी आखों में प्यार आज भी दिखता है........

320.
फिर उँगलियों के पोरो में,
धागों को उलझा रही हूँ...
कि सुलझा रही हूँ....
उलझे तो तुम्हारे ख्याल हो,
सुलझे तो तुम्हारे जवाब हो.....

Saturday, 13 May 2017

प्यार क्या होता है....!!!

तपती धूप में बारिश की बूंदों से,
तुम मुझ पर बरसते हो,
मैं तब खामोश हो जाती हो,
प्यार क्या होता है?जब तुम मुझसे पूछते हो....
किस्मत की लकीरों की तरह,
तुम मेरी हथेलियों पर सजते हो,
मिटा देती हूँ,
तुम्हारा नाम हथेलियों से,
प्यार क्या होता है?
जब तुम मुझसे पूछते हो...
ओस ठहरती है जैसे पत्तो पर,
इस तरह में दिल में तुम ठहरते हो..
मैं तब पल में बिखर जाती हूँ,
प्यार क्या होता है,जब तुम  पूछते हो....!!!

Thursday, 20 April 2017

तुम तो हार तभी गये थे...!!!

तुम्हारे लिए मुझे त्याग देना आसान था,
क्यों की तुम महान बनाना चाहते थे...
तुम खुद को संयम में,
बांध कर जीना चाहते थे,
क्यों कि तुम इक मिशाल बनाना चाहते थे...
मुझे नही पता कि,
तुम्हे तकलीफ हुई थी या नही...
पर तुम मुझे तकलीफ में छोड़ कर,
मुझे नजरअंदाज करके,
छोड़ कर चले गये...क्यों कि
इक आदर्श बनाना चाहते थे...
तुम्हे दिखाना था कि,
तुम किस तरह सब कुछ..
छोड़ सकते हो,
तुम्हे सभी को बताना था कि,
ये दुनिया....ये समाज तुम्हारे लिए,
कितना मायने रखता है....
मैने कोई शिकायत नही की तुमसे,
तुम्हारी हर नाराजगी पर चुप हो गयी..
तो तुमने खुद को योद्धा मान लिया...
मैंने प्यार में तुम्हे सर्वस्व अर्पित कर,
तुम्हारे सजदे में,
अपना सर झुका दिया...
तो तुमने खुद को महात्मा मान लिया....
तुम्हारी हर मुश्किल में,
मैं ढाल बन कर खड़ी रही,
तुम्हारी हर कमजोरी में,
तुम्हारा संबल बनी रही...
तो तुमने इसे मेरी जरुरत मान लिया....
तुम गलत थे...
हाँ मेरे लिए तुम महान,आदर्श,योद्धा,महात्मा,
सब कुछ थे..
कभी खुद को मेरी नजरो से देखते...
पर तुमने खुद को,
हमेशा दुनिया की नजरों से देखा...
इसलिए मेरी नजरो में,
तुम्हारे लिए जो सम्मान,जो प्यार था...
तुम देख ही नही पाये...
मैं जब भी कमजोर पड़ी,
तुम्हारे साथ के लिए गिड़गिड़ाई,
तो तुमने इसे...
अपनी जीत मान लिया......
मैं तो सिर्फ इक रिश्ते को,
निभाने की हर भरकस कोशिश कर रही थी,
पर अफ़सोस तुमने,
इसे भी मेरी जरुरत समझ लिया....
पर सच तो ये है...
तुम तो हार तभी गये थे,
जब तुम्हारी वजह से,
मेरी आँखों में आंसू थे....!!!

Wednesday, 19 April 2017

यूँ ही तुम्हारे साथ इक सफर याद आ गया...!!!

यूँ ही तुम्हारे साथ इक सफर याद आ गया...
मेरी गोद में तुम सर रख सो रहे थे,
और मैं तुम्हे निहार रही थी...
और रेलगाड़ी की खिड़की से चाँद,
हम दोनों के साथ-साथ चल रहा था...
इक सुकून था तुम्हारे चेहरे पर,
और इक मुस्कराहट थी,
तुम्हे निहारते मेरी आँखों में....
बहुत बेचैन था,
उस सफर पर वो चाँद,
अपनी चांदनी की याद में...
हम दोनों को देखने को,
चाँद हमारे पीछे-पीछे भाग रहा था,
वैसे तो मुझे हर रोज चिढ़ाता था,
चाँद अपनी चांदनी के साथ...
आज तो मैं भी चाँद को देख कर,
यूँ मुस्करा रही थी,
कि जैसे कह रही हूँ..कि आज तो,
मैंने भी अपने चाँद के साथ हूँ..

Wednesday, 29 March 2017

वो तुम्हारी आँखों की खामोश बाते..!!!

वो तुम्हारी आँखों की खामोश बाते,
ना जाने कब मुझे समझ आने लगी,
वो कुछ ना कह कर तुम्हारा मुस्करा देना,
ये अंदाज़ तुम्हारे....
ना जाने कब मेरी धड़कनो को बढ़ाने लगे..
मंजिले तो कब की,
मैंने पीछे छोड़ दी,
ना कब तुम्हारे साथ...
ये सफर ही मुझे रास आने लगे....
वो चाँद,वो तारे,
वो रातो की बाते अब लिखी जाती नही मुझसे..
अब तो मेरे ख्यालो में,
सिर्फ तुम्हारे एहसास मुस्कराते है,
मेरी धड़कनो से तुम्हारे जज्बात,
मेरे शब्दों में लिखने लगे...
वो तुम्हारी आँखों की खामोश बाते,
ना जाने कब मुझे समझ आने लगी..!!!

Sunday, 19 March 2017

वो प्यार तुम हो...!!!

मेरी मुस्कराती आँखों की,
वजह तुम हो,
मेरी खनकती चूड़ियों की,
सरगम तुम हो,
मेरी पायलों की,
छ्म-छ्म तुम हो...
ढलती शामो को,
सिंदूरी करते तुम हो...
जागती आँखों का इंतजार लिये,
वो राते तुम हो...
जिन ख्यालो से बढ़ जाती है,
धड़कने मेरी...
वो बाते तुम हो,
दर्पण में जो देखती हूँ...
खुद को यूँ बार-बार...
मेरा वो श्रृंगार तुम हो,
दुनिया को जो दीखता है..
मेरी आँखों में...
वो प्यार तुम हो...!!!

Thursday, 9 March 2017

कभी" और "काश"...!!!

कभी तुम्हारी हथेली से,
अपनी हथेली को जोड़ कर,
चाँद बनाना चाहती थी,
कभी अपने गालो से तुम्हारे गालो पर,
गुलाल लगाना चाहती थी...
सभी ख्वाइशें "कभी" और "काश"
पर आ कर ठहर गयी...
तुम वक़्त कभी निकाल नही पाये,
मैं वक़्त को थामे बैठी रही,
जिंदगी तुम्हारे-मेरे वक़्त से,
बहुत आगे निकल गयी....

खुद को ढूंढोगे...!!!

कभी तुम मुझे अखबारों में ढूंढोगे,
मेरी रची पंक्तियो में,
तुम मेरी सांसे गिनोगे....
मैं कहाँ हूँ,कैसी हूँ...
इन सवालो के जवाब,
पाने को बेचैन रहोगे..
जब मैं लिखती थी सिर्फ,
तुम्हारे लिए तब तुमने कभी पढ़ा नही..
अब जब मेरी रचना आती है अखबारो में,
तुम उनमे खुद को ढूंढोगे...!!!

Saturday, 4 March 2017

वुमेन डे"ना मनाना पड़े...!!!

वूमेन डे....😊
लीजिये ये इक निर्धारित किया गया है,
स्त्री के लिए,कहते है कि,
स्त्रियों के सम्मान के लिए ये दिन चुना गया है...
पर मैं आज तक समझ नही पायी,
कि क्या सच में किसी दिन की जरुरत पड़ती है,
स्त्री को सम्मान देने के लिए..
जो स्त्री सृष्टि को जन्म देती है,
जो खुद आदिशक्ति है..
क्या उसे किसी दिन की जरुरत है..
ये सिर्फ कुछ लोगो ने अपनी,
आत्मसंतुष्टि के लिए,
तीन सौ पैसठ दिन,
जिस स्त्री नजरअंदाज करते है,
उन्होंने इक दिन बना दिया,
और ये जता दिया कि,
हम स्त्री का सम्मान करते है....
और स्त्री ने भी मुस्करा कर,
उनका ये इक दिन का सम्मान रख लेती है....
और पूछती है कि कभी कोई,
"मेन डे"क्यों नही मनाया जाता?
क्यों कि इक स्त्री ने,
पुरुष को हमेसा सम्मान देती है,
पिता के रूप में,भाई के रूप में,पति के रूप में..
उसने सबकी भावनाओ को,
उनके बिना कहे समझा है,
बिना किसी स्वार्थ के,निश्छल,
हर रिश्ते को निभाती है...
तभी तो ये "वूमेन डे"मानाने वालो को,
कभी "मैन डे"की जरुरत नही महसूस की...
आप स्त्री के आत्मसम्मान की बात करते है,
पर आप ये भूल जाते है,
जिस स्त्री ने आपको सम्मान करना सिखाया है,
वो खुद अपने आत्मसम्मान की रक्षा कर सकती है,
और गर कही वो अपना आत्मसम्मान छोड़ती है,
तो इसका अर्थ ये नही कि,
वो कमजोर है,मुर्ख है..
बल्कि वो आपको बहुत प्यार करती है,
रिश्तों को संजोना जानती है...
इस सृष्टि में इक मात्र स्त्री ही है,
जो अपने रिश्तों के लिए,
किसी भी हद तक जा सकती है...
जिस स्त्री ने अपने माथे पर सजा कर,
आपको जो सम्मान दिया है...
उसकी कीमत ये इक दिन"वुमेन डे"
तो नही हो सकता है...
चलिये इस बार कुछ ऐसा करिये,
कोई संकल्प ऐसा लीजिये,
कि आपको किसी भी स्त्री के लिए,
"वुमेन डे"ना मनाना पड़े...

Friday, 24 February 2017

तब तुम मुझे पढ़ना...!!!

जब तुम खुद को बिल्कुल खाली समझना,
जब तुम्हे लगे कि जैसे,
कुछ है ही नही तुम्हारे लिये..
तब तुम मुझे पढ़ना,
मुमकिन है तुम्हे सब कुछ अपना ही सा लगे....
जब तुम्हे लगे कि,
कुछ नही रहा संजोने के लिये,
जब तुम हालातो से मजबूर बिखर जाओ,
तो मुझे पढ़ना...
खुद को मेरे शब्दों में समेट कर,
संजो कर रखा हुआ पाओगे..
जब तुम्हे लगे तुम खुद को,
कही रख कर भूल गए हो,
तो मुझे पढ़ना,
तुम्हारी खुद से मुलाकात हो जायेगी....
तुम खुद को इन पन्नो में  ही कही पाओगे...
जब तुम्हे कुछ बेचैन कर दे,
लगे कुछ अधूरा सा रह गया है,
तब तुम मुझे पढ़ना,
और मेरी लिखी हर रचना के अंत में,
क्रमशः......कुछ लिखा रह गया है...
तुम्हे उन्हें लिख कर पूरा कर देना...
तुम्हे पूर्ण जीवन मिल जएगा...!!!

Monday, 13 February 2017

प्यार महज इक शब्द ही तो था....!!!

प्यार महज इक शब्द ही तो था मेरे लिए,
पर तुमसे मिलने के बाद,
प्यार एहसास बन कर मुझे छू गया....
तुम क्या मिले..
प्यार के हज़ारों रंग मिल गए,सुबह,शाम,चाँद,तारे,बारिश,धुप,छाव...
जैसे हर शै में प्यार ही प्यार हो...
तुमसे जब से मिली,
नजरिये सारे जिंदगी के बदल गये,
बहुत गुमान था मुझे कि,
मैं नही किसी का इन्तजार करुँगी,
बहुत शर्ते लगी थी सखियों में कि,
मैं कभी इस तरह ना किसी से प्यार करूँगी...

तुमने कभी कहा नही पर,
तुम्हारे प्यार में हूँ,
ये बात ना कब दिल में उतर गयी,
तुमसे परे कुछ भी सोचना जैसे,
कोई अपराध लगता है,
तुमने कभी नही जताया,पर ,
इस तरह मुझ पर,
तुम्हारा अधिकार लगने लगा...

इस भीड़ में इक चेहरा कैसे,
इतना खास हो जायेगा,
ये तो सोचा ही नही था...
इस पूरी दुनिया में,
तुम ही मेरी दुनिया बन गये...
जादू ही तो जो इक बार चला तो,
फिर नही उतरा,
बस हद से ज्यादा गुजरता चला गया....

जब तक तुमसे नही मिली थी,
तब तक मैं इक स्त्री आजादी,
उसके स्वाभिमान,उसके आत्मसम्मान,
की बाते करती थी...
बाते आज भी वही है..
तुमसे मिल कर इन शब्द को अर्थ मिल गया,
मैंने जाना कि प्यार में,
इक स्त्री कमजोर नही होती,
समर्पित होती है....
ये समर्पण मैंने तुमसे मिलने के बाद समझा है...

प्यार में होना भी इक कला है,
मंदिरो की घंटियों सा गूंजता है,
तुम्हारा कहा इक-इक शब्द,
मेरे-तुम्हारे रिश्ते को मौली में बांध आती हूँ,
मंदिर की चौखट पर....
तुम्हे अपना सम्मान मान कर,
सजा लेती सिंदूर की तरह अपने मस्तक पर....

प्यार खुद अधूरा होकर भी पूर्ण है...
जिसने इसे महसूस कर लिया,
वो जी रहा है,वो भूल गया खुद को,
किसी के लिए...
मान लिया आधार किसी को जिंदगी के लिए...
प्यार महज इक शब्द ही तो था मेरे लिए...