Friday, 28 October 2016

काल चक्र घूमता है....!!!

काल चक्र घूमता है....
कल तक जो हाथ दीया लिए हुए,
दहलीज़ पर खड़े पुरे,
घर को रौशन कर रहे थे...
कि आज उन्ही हाथो ने,
मेरे हाथों में दीया थाम कर,
मुझे दहलीज़ पर खड़ा कर दिया है....
कल तक अंधेरो की,
परवाह किये बैगर,....जिस रौशनी पर,
मैं गुमान कर रहा था,
आज उसी रौशनी की कीमत,
मेरे अंधेरो ने मुझसे ली है....
कल तक जिन हाथो से,
मैं फुलझड़ियों की जिद,
पटाखों के शोर मांगता था...
आज उन्ही फुलझड़ियों की चिंगारी से,
पटाखों के शोर से,
मैं इस घर बचा रहा हूँ...
काल चक्र घूमता है....
कल तक मैं जहाँ महफूज़ था,
गहरी नींद में सो रहा था...
आज देर रात तक जागता हूँ...
काल चक्र घूमता है....
कल तक तुम जहाँ खड़े थे साथ मेरे,
आज वही अकेले मैं खड़ा हूँ..!!!

7 comments:

  1. बहुत सुन्दर

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  2. आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि- आपकी इस प्रविष्टि के लिंक की चर्चा कल रविवार (30-10-2016) के चर्चा मंच "आ गयी दीपावली" {चर्चा अंक- 2511} पर भी होगी!
    दीपावली से जुड़े पंच पर्वों की
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  3. बहुत सुंदर , दीप पर्व मुबारक !

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  4. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" रविवार 30 अक्टूबर 2016 को लिंक की गई है.... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  5. एक पक्ष यह भी होता है त्यौहारों का... बहुत सुन्दर!

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  6. बहुत ही उम्दा .... बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति .... Thanks for sharing this!! :) :)

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