Sunday, 11 September 2016

उन आँखों की अनकही....!!!

अपनी खूबसूरती तो...
मैंने तुम्हारी आँखों में देखी थी....
जो अपलक मुझे देखे जा रही थी,
कुछ अनकहे शब्द आँखों में,
उतर आये थे तुम्हारे,
होठ बेचैन थे उन शब्दों को कहने के लिये...
पर शायद मैं तैयार नही थी,
उन आँखों की अनकही को सुनने के लिये,
तभी तो तुम्हारे कुछ कहने से पहले,
मैंने अपनी नजरे फेर ली थी..
मुझे पता था ये नजरे मैंने तुमसे नही,
बल्कि अपनी जिंदगी से फेर रही हूँ...
तब से आज तक...
मैं उन आँखों की अनकही सुनने के लिए,
बेचैन हो भटकती रही हूँ...!!!

2 comments:

  1. बहुत सुन्दर

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  2. जय मां हाटेशवरी...
    अनेक रचनाएं पढ़ी...
    पर आप की रचना पसंद आयी...
    हम चाहते हैं इसे अधिक से अधिक लोग पढ़ें...
    इस लिये आप की रचना...
    दिनांक 13/09/2016 को
    पांच लिंकों का आनंद
    पर लिंक की गयी है...
    इस प्रस्तुति में आप भी सादर आमंत्रित है।

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