Thursday, 8 September 2016

कुछ पागलपन भी जरुरी था....!!!

कुछ पागलपन भी जरुरी था....
मैं भी तुम्हारे साथ,
कुछ नादानियाँ करना चाहती थी,
बारिश में छाते को फेंक को कर,
तुम्हारे साथ भीगना चाहती थी...
महकती भीगी हवाओं में,
तुम्हे महसूस करना चाहती थी...
यूँ बेवकूफियाँ कुछ,मारमार्जिया कुछ....
कुछ-कुछ मेरा पागल होना,
तुमको पागल कर देना भी जरुरी था....
तुम्हारी आँखों में देखकर,
कुछ झूठ बोलना चाहती थी..
या यूँ कहूँ की कुछ सच,
छिपाना चाहती थी....
यूँ ही बेवजह मुस्करा कर,
तुम्हे भी दीवाना बनाना चाहती थी...
मैं तो थी ही कुछ पागल,
तुम्हे पागल बनाना चाहती थी...
कुछ-कुछ मेरा पागल होना,
कुछ तुमको पागल कर देना भी जरुरी थी...

2 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (10-09-2016) को "शाब्दिक हिंसा मत करो " (चर्चा अंक-2461) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. तुम्हारी आँखों में देखकर,
    कुछ झूठ बोलना चाहती थी..
    या यूँ कहूँ की कुछ सच,
    छिपाना चाहती थी....

    Nice lines... congrats!

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