Friday, 6 November 2015

तुम्हारी देहरी से लौट आई हूँ...!!!

मैं अक्सर तुम तक जा कर,
तुम्हारी देहरी से लौट आई हूँ,
कल रात भी हवाओं के साथ,
तुम्हारी पर गयी थी,
देखा की तुम मेरे ही,
ख्वाबो में सो रहे थे,
सोचा सांकल खटखटा आऊं,
तुमको जगा कर कहूँ,
कि तुम्हारे ख्वाबो से निकल कर,
तुम्हारे पास आई हूँ...
फिर सोचा कि...
अपनी चूड़ियों की खनक से,
तुमको जगाऊं,
तुम्हे अपनी रंग-बिरंगी,
चूड़ियाँ दिखाऊं...
फिर सोचा क्यों ना,
चुपके से तुम्हारे कानो में,
वो कह दूँ...जो तुम...
मुझसे अक्सर सुनना चाहते थे....
फिर सोचा कि क्यों ना,
तुम्हारी साँसों में घुल जाऊं..
खुशबू बन कर,
तुम्हारे दिल में बिखर जाऊं...
पर डर था..कि
कही तुमने मुझे पहचाना नही तो...
भ्रम है...मुझे कि
तुम मेरे ख्वाबो में ही सो रहे हो..
कही वो टूट गया तो...
बस यूँ ही...
मैं अक्सर तुम तक जा कर,
तुम्हारी देहरी से लौट आई हूँ,..!!!

2 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (08-11-2015) को "अच्छे दिन दिखला दो बाबू" (चर्चा अंक 2154) (चर्चा अंक 2153) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. तुम्‍हारी देहरी से लौट आई हूं। बहुत ही भावपूर्णं रचना की प्रस्‍तुति।

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