Saturday, 10 October 2015

इक शाम..तुम्हारे साथ हो...!!!

बस यूँ ही....इक शाम..
तुम्हारे साथ हो...
जो ख्यालो में भी ना हो,
ऐसी कोई बात हो...
बस यूँ ही..इक शाम...
तुम्हारे साथ हो...
तुम कहो कुछ...
कुछ कहूँ मैं...
सभी शिकायते मेरी हो,
सभी नादानियाँ मेरी हो...
मैं रूठती रहूँ.....
तुम मुझे मानते रहो..
इक शाम सभी गुस्ताखियाँ,
मेरी माफ़ हो..
बस यूँ ही...इक शाम...
तुम्हारे साथ हो...
तुम्हारे हाथो में...
मेरा हाथ हो,
खामोशियों की हमारे बीच बात हो..
इक शाम मेरी मुस्कराहट..
तुम्हारे हर सवाल का जवाब हो...
बस यूँ ही....इक शाम..
तुम्हारे साथ हो...
इक शाम मेरी धड़कनो की,
तुम्हारी धड़कनो से बात हो...
ना लबों को हो इजाज़त,
कुछ कहने की..
सिर्फ इशारो में...
जाहिर जज्बात हो..
बस यूँ ही....इक शाम..
तुम्हारे साथ हो...!!!

4 comments:

  1. बहुत सुंदर

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  2. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, मैं और एयरटेल 4G वाली लड़की - ब्लॉग बुलेटिन , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  3. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (12-10-2015) को "प्रातः भ्रमण और फेसबुक स्टेटस" (चर्चा अंक-2127) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  4. ना लबों को हो इजाज़त,
    कुछ कहने की..
    सिर्फ इशारो में...
    जाहिर जज्बात हो..
    बस यूँ ही....इक शाम..
    तुम्हारे साथ हो...

    क्या बात है. सुंदर कविता. ये बातें यूँ ही चलती रहें.

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