Saturday, 9 May 2015

मैं अपना लिखा,तुमसे सुनना चाहती थी.....!!!

मैं अपना लिखा तुमसे,
सुनना चाहती थी...
अपने शब्दों में तो पिरोया था मैंने,
अब तुम्हारी आवाज़ में,
बुनना चाहती थी....
मैं अपना लिखा तुमसे,
सुनना चाहती थी....
मुझे पता था कि...
कविताओं में पहले तुम्हारा,
कोई iterest नही रहा पर जब,
मैं तुम्हे अपनी कविताओ,
को सुनाती थी..
तुम मेरा मन रखने के लिये,
उन्हें बहुत मन से सुनते थे....
फिर भी....मैं जब भी कुछ लिखती,
तुम्हे पढ़ कर सुनाती थी,
मैं जानती थी कि...
मैं जबरदस्ती तुम्हे सुना रही हूँ..
पर जब तुम...
मेरी कविताओं को पढ़ते थे,
और पढ़ते वक़्त,
तुम्हे चहेरे पर इतराते भाव,
आखों में वो चमक,
होटों की रहस्यमयी मुस्कान..
कि जैसे...
मेरी कविताओं की हर पंक्ति,
सिर्फ तुम्हारे लिये ही है...
उस पल.....
मैं तुम्हारी छवि अपनी आखों में,
कैद कर लेना चाहती थी...
न जाने क्यों..
मैं अपना लिखा,
तुमसे सुनना चाहती थी.....!!!

6 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (10-05-2015) को "सिर्फ माँ ही...." {चर्चा अंक - 1971} पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    मातृदिवस की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक
    ---------------

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  2. बहुत सुन्दर और भावपूर्ण रचना...

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  3. बहुत ही भावपूर्ण रचना प्रस्‍तुत की है आपने।

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  4. मुझे पता था कि...
    कविताओं में पहले तुम्हारा,
    कोई iterest नही रहा पर जब,
    मैं तुम्हे अपनी कविताओ,
    को सुनाती थी..

    ये अजीब सा प्रेम होता है जहाँ कोई नहीं भी सुनना चाहता फिर भी उससे सुनने की इच्छा| बहुत सुन्दर

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