Friday, 8 May 2015

कुछ बिखरी पंखुड़ियां.....!!! भाग-16

136-
तुम मुझे जीतने की,
इक कोशिश तो करो...
मैं तो खुद को पहले ही,
हार चुकी हूँ...

137-
मैं तुम्हे अपनी पंक्तियों में पिरोती रही...
तुम मेरे शब्दों में बिखरते रहे..

138-
तुमसे पहले मेरी कविताओं में...
सब कुछ था...पर प्यार नही था...

138-
ऐसा नही है कि तुम्हारे दर्द से,
मुझे वास्ता नही है...
बस...ये मैंने कहा नही है..

139-
तुम कही भी रहो....
मेरी लिखी पक्तियाँ जब भी सुनोगे...
वो तुम्हारी अपनी ही लगेंगी....

140-
तुम्हारी मुस्कानों पर...
मैं सब कुछ वारी जाऊं...
तुम इक बार मुझे अपना मानो,
मैं तुम्हारी हो जाऊं....

141-
लोग क्या समझंगे...
मेरी मुस्कराहटो को..
हमने आखों की नमी की छिपायी है..
इन्ही मुस्कानों के पीछे...

142-
कभी यूँ भी तो हो....
मैं तुम्हे सोचूँ और,
तुम भी मुझे याद कर लो....

143-
मेरी सारी उपलब्धियां तुम्हारी है......

144-
क्या हिसाब लगाती ..
कि तुमने मुझे क्या दिया है?
मैं तो उलझी रही...
कि तुम्हे पाने के लिये..
मैंने क्या-क्या खो दिया है.....

145-
तुम्हारे कांधे पर सर रख कर...
जो मैंने आँखे बंद की थी...
उस इक लम्हे में...
पूरी इक जिन्दगी जी थी....

2 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (09-05-2015) को "चहकी कोयल बाग में" {चर्चा अंक - 1970} पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक
    ---------------

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  2. waah bht khoob likha hai ....

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