Sunday, 13 July 2014

किताबो में शायद खुद को ढूंढ़ रही थी मैं........!!!

आज किताबो के ढेर में......                      
एक धुल से लिपटी किताब मिली..
पुरानी यादो की साक्षी....
गुजरे लम्हों की गवाही दे रही थी.....
यूँ ही पन्ने पलटते-पलटते....
कुछ धुंधला सा लिखा दिखायी दिया..
जो धुंधला हो गया था....
पर अभी मिटा नही था....
मुझे आज भी याद है...
कि यूँ किताब पढ़ते-पढ़ते...
तुम्हारा ख्याल आया था..
और मैंने मुस्करा कर......
अपने नाम के साथ....
तुम्हारा नाम लिख दिया था....
वो लम्हा गुजर गया....इक अरसा बीत गया....
ये किताब बहुत सारी....
किताबो में कही खो गयी थी...
पर मेरे उन लम्हों की....
मेरी अनजानी मुस्कराहटो की गवाही है.....ये किताब...
 किताब के कुछ और पन्ने पलटे ...
 वही कही कई परतो में मुड़ा हुआ....
एक कागज का टुकड़ा मिला....
अरे ये तो वही ख़त है....
जो कभी तुम्हारे लिए लिखा था...
पर तुमको दिया नही था.....
इक अनकहे डर से कि....
तुम्हारा जवाब क्या होगा.....
मैंने ये ख़त खुद तक ही रखा.....
तुम तक कभी पंहुचा ही नही...
कितनी पागल थी.....
बिना कोई सवाल किये.......
तुम्हारे जवाब के इन्तजार में.....
इक सदी गुजर गयी....
जिन्दगी की कभी इक पल यूँ भी लगा.....
जैसे बेवजह जिन्दगी जी रही हूँ....
खुद को कही भीड़ में खो दिया था मैंने.....
कि आज इन पुरानी यादो के ढेर में.....
मेरे अनसुलझे सवालो के जवाब मिल गए....
इन किताबो में शायद खुद को ढूंढ़ रही थी मैं........!!!

5 comments:

  1. बहुत सुंदर

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  2. यादों के इन खूबसूरत अहसासों को संजोये किताब .... गवाह हो गई

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  3. Wao........ speechless

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  4. सच में कुछ लोग कितने भाग्यशाली होते हैं उन्हें भी नही पता
    पर वो इन्सान बहुत ही भाग्यशाली है जिसका नाम आपने लिखा था अपने नाम के साथ

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