Saturday, 24 August 2013

अब तुम साथ नही हो......!!!

कुछ पल इन अंधेरो में,                                    
मुझे जीने दो.....
न जाने क्यों अँधेरे...
अब मुझे अच्छे लगते है... 
डरती तो मैं भी थी कभी इन अंधेरो से, 
तुम्हारे झूठे वादे भी सच्चे लगते थे........! 


कुछ पल इन अंधेरो से,
बाते कर लेने दो मुझे..... 
न जाने क्यों ये काले साये भी, 
अपने से लगते है....
डरती तो मैं भी थी कभी इन सायों से,
जब मेरे हमसफ़र बनकर चलती,
तुम्हारी परछाई भी सच्ची लगती थी.......! 

अब न रोको इन पतझड़ो को,
तस्वीरो में उतारने दो मुझे.....
कुछ पल और इन सूखे पत्तो के,
साथ गुजारने दो मुझे...... 
न जाने अब ये पतझड़ भी,
जिन्दगी से लगते है.....
डरती तो मैं भी थी कभी इन पतझड़ो से, 
जब तुम्हारे साथ सूखे गुलाब भी,
खिले से लगते है.........! 

अब मुझे चलने दो इन सुनी राहो पर, 
अब लगने दो ठोकरे मुझको..... 
न जाने क्यों ये राहे भी,
मंजिल सी लगती है...... 
डरती तो मैं भी थी इन ठोकरों से कभी, 
जब तुम्हारा हाथ थाम,
इन राहो पर सम्हला करती थी...... 

न रोको मुझे अब खो देने दो खुद को,
भूल जाने दो खुद को......
कि अब डर नही लगता कुछ भी खोने से, 
क्यों कि अब तुम साथ नही हो.……..............!!! 

















30 comments:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति.. आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी पोस्ट हिंदी ब्लॉग समूह में सामिल की गयी और आप की इस प्रविष्टि की चर्चा कल - रविवार- 25/08/2013 को
    वो शहीद कहलाते हैं ,,हिंदी ब्लॉग समूह चर्चा-अंकः5 पर लिंक की गयी है , ताकि अधिक से अधिक लोग आपकी रचना पढ़ सकें . कृपया आप भी पधारें, सादर .... Darshan jangra

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  2. जब दीवानगी हद से बढ़ जाती है तो खुद को खोने से भी डर नही लगता .....गहरे अहसास !
    शुभकामनायें!

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  3. The attached image speaking volumes about the feelings expressed!

    well presented!

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  4. कुछ पल इन अंधेरो से,
    बाते कर लेने दो मुझे.....
    न जाने क्यों ये काले साये भी,
    अपने से लगते है....
    डरती तो मैं भी थी कभी इन सायों से,
    जब मेरे हमसफ़र बनकर चलती,
    तुम्हारी परछाई भी सच्ची लगती थी.......!

    वाह बहुत सुंदर

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  5. नेटवर्क की सुविधा से लम्बे समय से वंचित रहने की कारण आज विलम्ब से उपस्थित हूँ !
    भाद्र पट के आगमन की वधाई !!
    आत्माभिव्यक्ति के लिये वधाई !!

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  6. नेटवर्क की सुविधा से लम्बे समय से वंचित रहने की कारण आज विलम्ब से उपस्थित हूँ !
    भाद्र पट के आगमन की वधाई !!
    आत्माभिवाक्ति हेतु वधाई !!

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  7. बहुत सुन्दर रचना.

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  8. kyun ki ab tum saath nahi ho!.........nice shandaar prastuti.............

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  9. आदरणीया अपकी यह प्रभावशाली प्रस्तुति 'निर्झर टाइम्स' पर लिंक की गयी है।
    कृपया http://nirjhar.times.blogspot.in पर पधारें,आपकी प्रतिक्रिया सादर आमंत्रित है।
    सादर

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    1. thank u....par apka ye link open nhi ho raha h....

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  10. डरती तो मैं भी थी कभी इन सायों से,
    जब मेरे हमसफ़र बनकर चलती,
    तुम्हारी परछाई भी सच्ची लगती थी.......!

    वाह बहुत सुंदर
    फुर्सत मिले तो शब्दों की मुस्कुराहट पर ज़रूर आईये

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  11. खोने को कुछ नहीं हो तो साहस बढ़ जाता है. सुन्दर रचना

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  12. अब मुझे चलने दो इन सुनी राहो पर,
    अब लगने दो ठोकरे मुझको.....
    न जाने क्यों ये राहे भी,
    मंजिल सी लगती है......
    डरती तो मैं भी थी इन ठोकरों से कभी,
    जब तुम्हारा हाथ थाम,
    इन राहो पर सम्हला करती थी......
    बहुत सुन्दर पंक्तियाँ .......

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  13. अब मुझे चलने दो इन सुनी राहो पर,
    अब लगने दो ठोकरे मुझको.....
    न जाने क्यों ये राहे भी,
    मंजिल सी लगती है......
    डरती तो मैं भी थी इन ठोकरों से कभी,
    जब तुम्हारा हाथ थाम,
    इन राहो पर सम्हला करती थी......
    बहुत सुन्दर पंक्तियाँ .......

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  14. बहुत बढिया अभिव्यक्ति

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  15. कुछ पल अंधेरों में मुझे जीने दो .... बहुत सुन्दर

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  16. बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति..................

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  17. वाह !!! बहुत गहरे अहसासों से भरी सुंदर रचना,,,

    RECENT POST : पाँच( दोहे )

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  18. प्रभावशाली प्रस्तुति .........

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  19. बहुत खुबसूरत रचना ....

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  20. खोने का डर ख़त्म हो जाये तो समझो जीवन को पा लिया

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  21. लाजवाब प्रस्तुति |

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  22. सुन्दर अभिव्यक्ति .खुबसूरत रचना
    कभी यहाँ भी पधारें।
    सादर मदन
    http://saxenamadanmohan1969.blogspot.in/
    http://saxenamadanmohan.blogspot.in/

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  23. बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति!

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  24. अनुपम भाव संयोजन ...

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  25. डरती तो मैं भी थी कभी इन सायों से,
    जब मेरे हमसफ़र बनकर चलती,
    तुम्हारी परछाई भी सच्ची लगती थी.......!

    Simple words with deep meaning...happy to read your poems..nice one.:)

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  26. कभी कभी अंधेरे में सच साफ दिखाी देता है ।

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  27. क्योकि तुम अब साथ नहीं हो ...
    [ ऐसा लगता है ..अभी भी बचा हुआ है कही कुछ ]

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