Friday, 8 February 2013

आठवा ख़त .......Valentine special..........


कभी उगते सूरज को तुम्हारे साथ देखना चाहती हूँ......
तो कभी ढलती शाम को तुम संग गुजारना चाहती हूँ......
कभी रात का लम्बा सफ़र.......तुम्हारी गोद में सर रख कर,
चाँद को एकटक निहारते गुजारना चाहती हूँ.........
चाहती तो मैं यह भी हूँ....................
एक दिन हम आसमान के सारे तारो को गिन डाले........
ना जाने क्यों तुम्हारे साथ अब कुछ भी नामुमकिन सा नही लगता........!!!
                                                                                        
                                                                                          आहुति 


                                     

12 comments:

  1. वाह ...बहुत प्रबल विश्वास दर्शाती रचना ...!!
    सुंदर अभिव्यक्ति ...

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  2. your poems i read daily......excellent are the expressions...good...pls keep it up

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  3. समर्पण के साथ लिखी गयी सुन्दर रचना!

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  4. कभी उगते सूरज को तुम्हारे साथ देखना चाहती हूँ......
    तो कभी ढलती शाम को तुम संग गुजारना चाहती हूँ......
    कभी रात का लम्बा सफ़र.......तुम्हारी गोद में सर रख कर,
    चाँद को एकटक निहारते गुजारना चाहती हूँ.........

    गजब की अभिलाषा

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  5. प्यार का आठवां पायदान

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  6. चाह सुंदर है..चाह पूर्ण ही हो यह आग्रह नहीं...

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  7. आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टि की चर्चा कल रविवार 10-फरवरी-13 को चर्चा मंच पर की जायेगी आपका वहां हार्दिक स्वागत है.

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  8. sundar bhavnatmk prastuti, sundar khato aur khataon ka silsila jari rakhiye

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  9. बहुत प्यारी रचना

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