Saturday, 1 December 2012

हर पल हर लम्हा........!!!

हर पल हर लम्हा खुद से ही लड़ रही हूँ मैं...
सवाल जवाबो के इन उलझनों में,
खुद के अन्दर चल रहे.....तुफानो से हर पल
बिखर रही हूँ मैं.......
एक तरफ मेरे साथ मेरी भावनाओ की गहराइयाँ है.....
इक तरफ मेरी तन्हाईयाँ है,
मंजिल की तलाश में दर-दर भटक रही हूँ मैं.....
किसी के इन्तजार में अंजान किसी आहट पर,
सहम कर ठहर  रही हूँ मैं......
अपनी चाहतों,अपनी ख्वाइशों में,
टूटने की हद तक गुजर रही हूँ मैं.......
इक रौशनी की तलाश में कितने,
अंधेरो से घिर रही हूँ मैं.....
इतनी तन्हा हो गयी हूँ कि......
खुद को भी अनजान सी लग रही हूँ मैं........!!!

32 comments:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    दो दिनों से नेट नहीं चल रहा था। इसलिए कहीं कमेंट करने भी नहीं जा सका। आज नेट की स्पीड ठीक आ गई और रविवार के लिए चर्चा भी शैड्यूल हो गई।
    आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (2-12-2012) के चर्चा मंच-1060 (प्रथा की व्यथा) पर भी होगी!
    सूचनार्थ...!

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  2. इतनी तन्हा हो गयी हूँ कि......
    खुद को भी अनजान सी लग रही हूँ मैं........!!!

    आपने बहुत ही खूबसूरती के साथ अपने इन भावों को प्रस्तुत किया हैं।

    मेरी नयी पोस्ट पर आपका स्वागत है
    http://rohitasghorela.blogspot.com/2012/11/3.html

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  3. कितने सारे फूल खिले हैं,
    बिखरे रंग सुगंध हवा है,
    उड़ती तितली पक्षी गाते,
    फिर उपवन क्यों उदास है...
    सुंदर प्रस्तुति
    सादर-देवेंद्र
    मेरे ब्लाग पर नई पोस्ट अन्नदेवं,सृष्टि-देवं,पूजयेत संरक्षयेत पर आपका हार्दिक स्वागत है।

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  4. किसी के इन्तजार में,
    अंजान किसी आहट पर,
    सहम कर ठहर रही हूँ मैं......

    जी .... ठहरा ही कहां जा सकता है......?

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  5. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!

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  6. इतनी तन्हा हो गयी हूँ कि......
    खुद को भी अनजान सी लग रही हूँ मैं........!!!
    बहुत सुन्दर प्रस्तुति!

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  7. अच्छी प्रस्तुति!

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  8. इक रौशनी की तलाश में कितने,
    अंधेरो से घिर रही हूँ मैं.....
    इतनी तन्हा हो गयी हूँ कि......
    खुद को भी अनजान सी लग रही हूँ मैं.

    चलिए हम दुआ माँगते हैं ये तन्हाई टूटे और आपको मंजिल मिले

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  9. बहुत ही बढ़िया सुषमा जी !


    सादर

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  10. बेहद भावपूर्ण रचना..
    इक रौशनी की तलाश में कितने,
    अंधेरो से घिर रही हूँ मैं.....
    इतनी तन्हा हो गयी हूँ कि......
    खुद को भी अनजान सी लग रही हूँ मैं........!!!
    very touchy line......

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  11. वाह सुन्दर उम्दा प्रस्तुति खासकर ये पंक्तियाँ तो दिल को छू गईं
    अरुन शर्मा
    www.arunsblog.in


    एक तरफ मेरे साथ मेरी भावनाओ की गहराइयाँ है.....
    इक तरफ मेरी तन्हाईयाँ है,
    मंजिल की तलाश में दर-दर भटक रही हूँ मैं..

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  12. यही आत्ममंथन जीवन का सार है, सुंदर रचना.

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  13. akelepan ka khubsurat chitran kiya hai apne...sundar

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  14. जीवन में कभी ऐसे पल भी आते हैं जब हम खुद से भी अंजान हो जाते हैं...
    बहुत अच्छी प्रस्तुति ...

    अनु

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  15. यह स्थिति शायद तब आती है जब हम खुद से मिलते हैं...और फिर कुछ याद आता है और बहुत कुछ पीछे छूट जाता है..

    अपने वजूद के ऊपर एक लाजवाब और सराहनीय रचना..|

    सादर नमन|
    -मन्टू

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  16. सुन्दर कविता. साहिर ने कहा था-

    रात भर का मेहमाँ अँधेरा
    किसके रोके रुका है सवेरा

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  17. सुन्दर लिखा है ..

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  18. सुन्दर रचना.

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  19. शब्दों की जीवंत भावनाएं... सुन्दर चित्रांकन.
    बहुत सुंदर भावनायें और शब्द भी.बेह्तरीन अभिव्यक्ति!शुभकामनायें.
    आपका ब्लॉग देखा मैने और कुछ अपने विचारो से हमें भी अवगत करवाते रहिये.

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  20. अंतर्द्वंद परन्तु कुछ कर दिखने की ख्वाइश ....सार्थक रचना

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  21. खुबसूरत अभिवयक्ति, सार्थक प्रस्तुति.

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  22. कल 08/12/2012 को आपकी यह बेहतरीन पोस्ट http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जा रही हैं.आपकी प्रतिक्रिया का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  23. सुन्दर रचना

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  24. बहुत ही बेहतरीन रचना है

    - vivj2000.blogspot.com

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  25. सुन्दर चित्रण...उम्दा प्रस्तुति...बहुत बहुत बधाई...

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  26. bahut achha likha hein...
    इक रौशनी की तलाश में कितने,
    अंधेरो से घिर रही हूँ मैं....

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  27. कभी तनहा सी लगती है जिंदगी कभी जैसे एक भीड़

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